आंदोलन से ही बदलता है समाज, इतिहास गवाह है: गांधी-अंबेडकर होते तो पूछते और कहते—अन्याय के खिलाफ आवाज उठाना गलत कैसे?
समाज के भीतर से बदलाव आने की बात अपनी जगह सही हो सकती है, लेकिन जब समाज की व्यवस्था ही अन्याय को बनाए रखने लगे, तब बदलाव की मांग कौन करेगा? इतिहास गवाह है कि कई बार आंदोलनों ने ही समाज को उसकी गलतियों का एहसास कराया है। आज भारत और उसमें पनपे पॉलिटिक्स परिदृश्य को इसी कसौटी पर परखने की जरूरत है। विशेष टिप्पणी समाज में बदलाव कैसे आता है? क्या वह केवल समाज के भीतर संवाद, आत्ममंथन और स्वैच्छिक सुधार से आता है, या फिर तब भी आता है, जब लोग अपने अधिकारों के लिए सड़कों पर उतरते हैं, सत्ता से सवाल करते हैं और अन्यायपूर्ण व्यवस्था को चुनौती देते हैं? यह सवाल आज के सियासी संदर्भ में महत्वपूर्ण हो जाते है, जिसमें आंदोलनों को बदलाव और समस्याओं के समाधान का प्रभावी माध्यम मानने के बजाय समाज के भीतर से समाधान निकलने पर जोर दिया गया है। किसी भी समाज में स्थायी परिवर्तन के लिए समाज और उसके लोगों की सोच बदलना, सामाजिक जिम्मेदारी बढ़ाना और आपसी संवाद जरूरी है। लेकिन सवाल यह है कि अगर समाज के भीतर मौजूद व्यवस्था ही किसी वर्ग के साथ भेदभाव कर रही हो, अगर सत्ता जनता की मांगों को अनसुना कर रही हो और अगर...