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ज्ञान देने वाले गुरु से कार्य पूरा करने वाले कर्मचारी

भारतीय परंपरा में गुरु का स्थान केवल एक शिक्षक के रूप में नहीं रहा है। गुरु को ज्ञान, मार्गदर्शन और जीवन-दृष्टि देने वाले व्यक्ति के रूप में सम्मान दिया गया। अलग-अलग ऐतिहासिक कालों और धार्मिक-सामाजिक परंपराओं में शिक्षा देने के तरीके बदलते रहे, लेकिन गुरु और शिष्य के संबंध में ज्ञान के साथ संस्कार और जीवन-दृष्टि का महत्व बरकरार रहा। सीखने की गुरुकुल परंपरा में एजुकेशन केवल किताबी ज्ञान तक सीमित नहीं थी। छात्र गुरु के सान्निध्य में रहकर अध्ययन करता था और जीवन के व्यवहारिक पक्षों को भी समझता था। शिक्षा का मकसद केवल परीक्षा या रोजगार नहीं, बल्कि व्यक्ति के समग्र विकास से जुड़ा था। बदलते वक्त और दौर के साथ समाज बदला, शिक्षा की संस्थाएं बदलीं और ज्ञान के प्रसार के माध्यम भी बदलते गए। मठ, मंदिर, मदरसे, पाठशालाएं, गुरुकुल, चर्च और बाद में आधुनिक स्कूल-कॉलेज एवं विश्वविद्यालय शिक्षा के अलग-अलग संस्थागत रूपों के रूप में विकसित हुए। विभिन्न धार्मिक और सामाजिक परंपराओं ने अपने-अपने तरीके से ज्ञान के प्रसार में भूमिका निभाई। आधुनिक शिक्षा व्यवस्था ने शिक्षा को अधिक संगठित, व्यापक और संस्थागत बनाया...

नोट्स के बजाय नई क्रिएटिव सोच देना ही असली गुरु

टीचर" शब्द का अर्थ  बस स्कूल, कॉलेज, कोचिंग में पढ़ाने वाले टीचर्स से नहीं होता है? टीचर हमारे जीवन का हर वह व्यक्ति है जिससे हमने कुछ सीखा हो और जिसने सिखाया हो ,जैसे कि मां बाप हमे जीवन मे बहुत कुछ सिखाते है , दोस्त भी हमे कुछ न कुछ सीख देते है, कई ऐसे रिश्ते जो हमें कहीं न कहीं बहुत सी बातें सिखा जाते है, कई ऐसे अजनबी व्यक्ति भी हमारे जीवन में आते है जो कुछ ही मिनटों में बहुत अच्छी सीख दे जाते है, कुछ ऐसी किताबें जिन्हें पढ़कर भी हम बहुत कुछ सीखते ,और कुछ जीवन के ऐसे दृश्य जिन्हें देखकर हमे अच्छी बुरी सीखे मिलती है। टीच शब्द का मतलब सीख ,जो हमें कभी भी किसी भी रूप में मिल सकती है अब एक टीचर वह जो हमें स्कूल, कॉलेज या किसी शैक्षणिक संस्था जैसे कोचिंग में मिलते है जो हमें बेहतर भविष्य के लिए जागरूक, शिक्षित करते है जिससे हम अपना जीवन अच्छे से व्यतीत कर पाए आगे बढ़ पाए अपनी इच्छाओं को पूरा कर पाए। मेरे अनुसार हर वह व्यक्ति, हर एक दृश्य, रिश्ते, किताबें  टीचर है जो हमें सिखाते है या जिनसे हम सीखते है, सब टीचर है।   आज का टीचर मानसिक तौर से लेकर व्यवहारिक और व्यापारिक होने ...

राजनीति की लड़ाई में गढ़े सियासी शब्द, व्यवहार के साथ भाषा में भी मानव बनें दयालु और क्षमाशील

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उग्रवादी -माओवादी-नक्सल, अर्बन नक्सल और अब दिमागी नक्सल ये सभी शब्द नेताओं की ओर से की गई टिप्पणी और तंज से निकले हुए है, जो  राजनीति और इतिहास के अलग-अलग संदर्भों से जुड़े हैं। आजादी के आंदोलनों से शुरु हुए शब्द असली किसानों के लिए भूमि की लड़ाई से होते हुए सियासत में प्रशासनिक व्यवस्था के शब्द बन गए है। अब सबसे बड़ा सवाल ये है कि क्या विरोध करने वाले या लोकतंत्र में अपने हक अधिकार में आवाज उठाने वाले  जंगल के नक्सली का रुप बदल गया है, या नक्सली जंगल से निकलकर प्रशासन और सरकारी व्यवस्था का हिस्सा बन गए है। तो सबसे बड़ा सवाल है कि क्या ऐसे लोग सत्ता से सच में जंगलवासियों और किसानों के लिए सवाल करते है , उनके लिए हक मांगते है। या सिर्फ अपनी राजनीति चमकाते हैं।   उग्रवाद उग्रवादी एक व्यापक राजनीतिक शब्द है जो भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के 'गरम दल' (1905) से लेकर आधुनिक आक्रामक तेवर वाले राजनीतिक या वैचारिक गुटो के लिए इस्तेमाल होता है। उग्रवादी  शब्द किसी विशेष भौगोलिक स्थान से नहीं, बल्कि आक्रामक और आन्दोलनकारी कार्यशैली अपनाने वाले लोगों के लिए गढ़ा गया...

चमक- दमक वाले विकास की आंधी में मानव ने एक दूसरे को बनाया नक्सली

आजकल विकसित होने की बयार खूब तेजी से चल रही है, इसमें बयानों की आंधी और स्क्रीन से लेकर अखबार और किताबों के पन्नों की धारदार लेखनी भी तेजी से स्पीड पकड़ रही है कि अब बस हम विकसित करके की दम तोड़ेंगे। पर क्या आप जानते है सीमेंट कंक्रीट के इस आसमानी विकास की दौड़ से हम अपने राष्ट्र को विकसित कर लेंगे।  क्या हम किसान, मजदूर , युवा, महिलाओं और गरीबों की सिर्फ बात करके भाषण देकर भारत को विकास की असली ऊंचाई पर पहुंचा सकेंगे। विकास की सबसे छोटी और पहली इकाई है, मानव। भारत को विकसित बनने से पहले मानव के विकास की बात करनी चाहिए , क्योंकि बगैर इसके सबकुछ अधूरा है। रक्षा शक्ति से लेकर ऊर्जा शक्ति और  सॉफ्ट पावर से गति शक्ति तक किसी की बात करने से पहले मानव और उसको मिलने वाले मौके पर बात करनी चाहिए। हमें सड़क की गतिशीलता से अधिक शिक्षा और सामाजिक शक्ति को मजबूत करने की जरुरत है। जिसके जरिए देश में साइंस और साहित्य शक्ति बढेगी, और ये दोनों  मानव की मानसिक और मसल्स पॉवर के साथ सांगठनिक शक्ति तो बढाएंगे ही देश की रक्षा में भी अमूल्य योग्दान दे सकेंगे। ताकि फिर से कोई विदेशी लूटेरा देश क...

तकनीकी रूप से पश्चिमी कल्चर से आया जेन जी शब्द, प्रचार में क्यों पड़ रहा है भारी, तत्काल इस पर लगे रोक

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भारत की राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के जंतर मंतर से लेकर आदिवासी राज्य झारखंड की राजधानी रांची में युवा छात्रों के प्रोटेस्ट को जेन जी प्रोटेस्ट कहना कितना उचित है?। पश्चिमी संस्कृति से उपजा जेन-Z साहित्य और संस्कृति के जरिए दुनिया में छाप छोड़ने भारत में कितनी तेजी से फैला, इस पर सोचने की जरूरत है।  क्या हम राजनीति के चक्कर में अपनी ही संस्कृति की छवि को धूमिल कर रहे है, या कम आंक रहे है। मीडिया के प्रचार और सियासी हमले में हमारे अपने ही नेता अपनी संस्कृति का मूल्यांकन या तो सही से नहीं कर रहे या अपने सियासी चश्मे से कम कर रहे है।  हमारी अपनी भारतीय संस्कृति में तो युवाओं को नहीं पूरे जीवन काल को बांटा है। फिर हम युवाओं को क्यों श्रेणियों में तोड़ रहे है। नई तकनीक और उनके इस्तेमाल का दौर आता -जाता है।  लेकिन क्या राष्ट्र की भविष्य शक्ति युवा को विभाजित करना कितना सार्थक है, ये आप सोचिए। कई हम अपने देश की युवा शक्ति को गलत शब्दों और सियासी चश्मे में बांटकर और तोड़कर उसे दिग्भ्रमित तो नहीं कर रहे।   कई स्टूडेंट जिनमें ढंग से सोच विकसित भी नहीं हुई होती, वो राजनीतिक छात्र...

कौन चुना गया और कौन सी पार्टी सत्ता में आई, इससे आगे सोचने की जरुरत

विजेता ही सब कुछ ले जाता है, उपविजेता को कुछ नहीं मिलता,  चुनावी प्रणाली और जीत को नए सिरे से परिभाषित करने की आवश्यकता । इसे इस उपचुनाव के उदाहरण से समझ सकते है।  30 जुलाई 2026 को बिहार की बांकीपुर उपचुनाव में करीब 35 फीसदी वोटिंग हुई। गुजरात की मंजलुपर विधानसभा सीट पर 37.5 फीसदी मतदान हुआ।   बांकीपुर में करीब 3 लाख 80 हजार वोट है। पीके को 64 हजार 151 वोट मिले। पीके करीब 19 हजार से अधिक मतों से जीते, यानि उन्हें करीब 17 फीसदी वोट मिले, जबकि 83 फीसदी जनता उनके विरोध में है। हम पीके की जीत पर सवाल नहीं उठा रहे है, लेकिन लोकतांत्रिक देश में क्या अब चुनाव प्रणाली व्यवस्था में सुधार की जरुरत है। क्योंकि बिहार की राजधानी पटना जिले की शहरी विधानसभा सीट पर इतना कम वोट परसेंट क्या वाकई मजबूत और दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश की परिभाषा को झुठला रहा है। बिहार वो भूमि है, जिसने दुनिया को लोकतंत्र दिया। हमारा निर्वाचन आयोग इतने दशकों बाद भी ऐसी सीटों पर मतदान परसेंट बढ़ाने में क्यों असमर्थ है । बिहार की बांकीपुर सीट जैसे हालात गुजरात की मंजलपुर विधानसभा सीट के है, यहां बीजेपी क...

कानून और सजा से नहीं , सिस्टम और शिक्षा प्रणाली के सुधार से पेपर लीक पर लगेगी रोक

देश के प्रधान ने साफ साफ शब्दों में कहा युवाओं की भलाई और भविष्य से ज्यादा जरूरी कुछ भी नहीं हैं। छात्रों के हितों की रक्षा के लिए हर कदम उठाया जाएगा।  युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ करने वाले  किसी भी व्यक्ति को बख्शा नहीं जाएगा। पीएम के इस बयान के बाद पक्ष- विपक्ष के साथ जनता के बीच में फिर से नई बहस शुरु हो गई।  छात्रों के प्रदर्शन में लोकतंत्र की रक्षा करने वाली खाकी की लाठी देश के भविष्य पर वार कर रही है। जिस लाठी को लड़कियों की सुरक्षा में वार करना चाहिए था, वह देश को शर्मसार करने वाली हरकत कर रही है। आज सरकार को तो शर्मिंदा होनी चाहिए, लेकिन उससे पहले उस खाकी को शर्म से डूब मरना चाहिए जो सिविल ड्रेस की आड़ में बदनाम हो रही है। जिस खाकी को रक्षा करनी थी, वह माथा फोड़ रही है, सड़क पर भारत के भविष्य को घसीट रही है, दौड़ा रही है। और सरकार संवाद करने के इंतजार में मौन खड़ी है। राजनीति की आड़ में ही सही युवा छात्रों की मांगों को प्रोटेस्ट से पहले ही बात मान लिया जाता, या उन्हें अब दिया जाने वाला आश्वासन को सरकार पहले ही दे देती तो प्रदर्शन पुलिस पिटाई और पॉलिटिक्स शुरु ही न...