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Showing posts from January, 2020

नए राष्ट्र निर्माण का रास्ता - अम्बेडकर का मूकनायक

नए राष्ट्र के निर्माण का रास्ता- अंबेडकर का मूकनायक    पत्रकारिता की प्रतिबद्धता का प्रतीक- मूकनायक  "स्वाभिमान, स्वबल, समानता, समान अधिकार, स्वाधीनता, स्वराज, स्वतंत्रता, सुद्रढ़ता, संघर्ष, संगठन का संकेतात्मक प्रतीक  है"- अंबेडकर   31 जनवरी 1920 को डॉ भीमराव अंबेडकर के भावी महान कार्य, विचारों की झलक दिखलाता समाचार पत्र मूकनायक का प्रकाशन हुआ था ।जिसका शताब्दी वर्ष है।सौ साल बीत जाने के बाद भी बाबा साहब के विचार वर्तमान दौर को  सटीक राय दे रहे है। मूकनायक के कुल19 अंक निकले ।जिनमें शुरू के 12 अंक के प्रकाशन  का संपादकीय स्वयं डॉ बाबासाहेब आंबेडकर ने किया।हालांकि  संपादक के रूप में उनका नाम नहीं है ।क्योंकि उस समय वे सिडहेम कॉलेज के प्रोफेसर थे ।पर पत्र में उनके विचारों की झलक ,कार्यो की भागीदारी स्पष्ट नजर आती है । दत्तोबा पवार  डॉ अम्बेडकर को पेपर निकालने की  आर्थिक सहायता राशि के लिए राजर्षि शाहू महाराज  के पास लेकर गए।इसी राशि से मूकनायक पाक्षिक निकला ।13 से 19 कुल 7 अंकों का संपादकीय ज्ञानदेव ध्रुवनाथ घोलप ने किया। अप्रिय प्रसंगों के साथ-साथ डॉ बाबा साहब को  शिक्षा के ल

सपनों में सपनों का जलता बूझता दीपक -विच्छेदक

सपनों में सपनों का जलता बूझता दीपक -विच्छेदक  यह मूवी सपनों के सस्पेंस और थ्रिल पर आधारित है ।जो दर्शकों को देखने के लिए प्रेरित के साथ साथ रिझाएगी । और कुछ सबक भी सिखाएगी।   संस्कृति के बदलते दौर में बाप बेटा एक दूसरे के बारे में क्या सोच रखते है ।क्या सपनें क्या हकीकत क्या बदलाव या बीमारी  ।पूरी मूवी में यह सस्पेंस बना रहता है । जो दर्शकों को देखने से समझ में आएगा।एक लेखक जो सपनों की दुनियां से उठाई स्क्रिप्ट को फ़िल्म में बदलना चाहता लेकिन ज्यादातर फिल्ममेकर्स  स्क्रिप्ट को रिजेक्ट कर देते है विश्वास नहीं करते।इससे लेखक और सोच में पड़ जाता है।वास्तव में  सपनों की फिल्मी स्टोरी की स्क्रिप्ट लेकर घूमता फिरता दिखाता भटकते लेखक को  घटनाओं का शिकार होकर दर्द झेलना पड़ता है जिसे मूवी में बखूबी फिल्माया गया है। मूवी में सस्पेंस का बरकरार रहने अच्छी स्टोरी लाइन  के साथ बेहतरीन सिनेमेटोग्राफी सीन कनेक्टिविटी के साथ कहते हुए मूवी को रुचिदार बना रहे है ।जो दर्शको को शुरू से अंत तक बांधे रखते है। बाप बेटे की वर्तमान व्यवहार की एक इमेज ऐसी है जिस पर आपकी नजर थमकर सोचने को मजबूर कर देंगी। लेखक का क

अंडा परोसने में सरकारें कतराती है ?

  सबसे पहले यह जानना जरूरी है किअंडे क्यों खिलाना चाहिए । कई बीमारियों का ताल्लुक आहार से होता है ।ऐसे में प्रोटीन युक्त संतुलित आहार देकर बच्चों को कुपोषित बीमारियों से बचाया जा सकता है । मिड डे मील में अंडे शामिल करने से बच्चों की उपस्थिति में इजाफा होता है। अंडे खिलाना अन्य खाद्य  पदार्थो से सुरक्षित भी  है।इसमें फूड प्वाइजनिंग जैसी समस्या नहीं होती ।अंडे बांटने में भी आसान होते है। और खराब होने के चांस नहीं होते। भारत में कुपोषित बच्चों की संख्या सबसे अधिक है । अंडा खाने से कुपोषित दूर होने के साथ साथ बच्चे का  विकास भी होता है । इससे बच्चे के स्वास्थ्य ,मानसिक और शारीरिक विकास में सहायता मिलती है। पिछले साल सरकारी संयुक्त समीक्षा मिशन कह चुका है कि हमारे देश में 40 प्रतिशत बच्चे खाली पेट स्कूल जाते हैं । मिड डे मील ही ऐसे बच्चों का पहला भोजन होता है ।इसलिये मिड डे मील को पौस्टिक और प्रोटीन युक्त सतुलित होना चाहिए । बच्चो के विकास के साथ साथ अंडे से पोल्ट्री रोजगार भी बढ़ता है । स्थानीय पंचायत  ग्राम स्तर पर परिवार की स्थितियां मजबूत होगी । लेकिन सरकारें बच्चों की थाली में अंडा परो

CAA का कम NPR और NRC का है मुख्य विरोध

नागरिकता संशोधन कानून 2019 भले ही सत्तापक्ष की निगाहों में नागरिकता छिनने वाला कानून नहीं है ।लेकिन जब से यह कानून संसद से पारित हुआ है लोग भारी तादाद में सड़कों पर आने लगे हैं।सड़क पर प्रदर्शन करने वाली जनता में ज्यादातर मुस्लिम हैं।ऐसा सत्ता  पक्ष की सरकार मानती है। सरकार का ऐसा मानना  है कि जनता में नागरिकता छीनने का भ्रम और अफवाहें विपक्ष द्वारा फैलाई जा रही है। इसी कारण गुमराह और भ्रमित होकर लोग सड़क पर प्रदर्शन कर रहे हैं प्रदर्शनों में कहीं-कहीं पुलिस की बर्बरता भी सामने आई। युवाओं की शक्ति वाले भारत में कई जगह  छात्र-छात्राओं को पुलिस के डंडों का शिकार भी होना पड़ा। कई निजी चैनलों का मानना है कि पुलिस जिस तरह डंडों का उपयोग कर रही है वह न्यायसंगत और सुरक्षात्मक की अपेक्षा  योजनात्मक अधिक लग रहा है। सड़क के कोने से गूंजती महिलाओं  ,युवा छात्र -छात्राओं और युवकों की आवाज ठंड में शीतलहर की तरह फैल रही है। जिसमें सरकार की दम घुट रही है। सरकार  इस विरोधी आवाज के विरोध में जन जागरूकता अभियान चला रही है जो प्रदर्शन के बिल्कुल विपरीत है। डोर टू डोर लोगों को समझाने का प्रयास किया जा रहा

विश्व विद्यालय और महाविद्दालय में राजनीति मैदान से ना हो नियुक्ति

वैसे तो हरेक को जीवन में  सहारा सहायता सेवा  समर्थन की जरूरत पड़ती है बात  टैलेंटेड की हो वो भी युवा के ,तो बाबा साहेब को मानने वाले युवाओं को बाबा साहेब की बात सदैव याद रखनी होंगी जिसमें उन्होंने कहा था युवाओं को राजनीति में आने से पहले अपना पूरा फोकस पढ़ाई पर केंद्रित करें। नेता बनकर भी छात्र समाज  कुर्ते के पिछलग्गू कोने को पकड़ा हुआ रहता है ।  पार्टियों के दोनों पलड़े एक समान है ।एक छिनने वाला और दूसरा ना देने वाला ।  इन शब्दों में छात्र समाज की सतायी और तबाही आवाज के सुर है ।  कुछ नए नए  नेता  छिटपुट भैया इंटरव्यू लेने को तैयार है।उन्हें क्यों नहीं ये बात समझ में आती  की पढ़ने वाला छात्र  को  पढ़ने दिया जाए ।भारत के वर्तमान उपराष्ट्रपति  भी यह बात कह चुके है कि शैक्षणिक संस्थाओं को राजनीति विघटनकारी विचारधारा से दूर रखना होगा । उनका कह देना ही पर्याप्त नहीं है ।उन्हें  और उनकी सरकार को इस बात पर अमल भी करना चाहिए और स्वयं इस  बात को संज्ञान में लाकर शैक्षणिक संस्थानों में नियंत्रित प्रशासनिक पदों पर नियुक्तियों को राजनीति के मैदानी मोड़ से हटाकर सिविल एग्जाम के मैदानी अधिकारी के हाथों मे

देशहित में सेवा और खरीद

आध्यात्मिकता की ऊंचाई को छूना है तो साधना अपने लिए नहीं दूसरों के लिए होना चाहिए।आपकी साधना तभी सार्थक है जब उससे दूसरों को लाभ मिलें। तभी सफल साधना मानी जायेगी।करुणा दया सैद्धांतिक   के साथ साथ व्यवहार में होना चाहिए ।पेटियों में रुपए डाल देना मूर्तियों पर चढ़ा  देना ही दान नहीं होता। दान अकेले रुपए का नहीं होता मानव उन्नति उसके विकास में  निस्वार्थ भाव से  किया गया सहयोग,  किया गया कार्य ,दिया गया समय भी दान है।  गरीब दीन दुखियों  के हित में लिया गया सही विचार भी दान कहलाता है। ।  इसी सेवा भाव से श्रमदान संस्था काम कर रही है ।जो शराब और मांसाहार  छोड़ने की शर्त पर गांव के लोगों को रोजगार दे रही है। साथ में भारत की विकेंद्रीयकरित अर्थव्यवस्था पर फोकस करते हुए मजबूती प्रदान कर रही है। निस्वार्थ भाव से सेवा में लगी श्रमदान संस्था वैकल्पिक रोजगार दे रही है। स्वदेशी के साथ-साथ आधुनिकता का ख्याल भी रखी हुई है ।जो मॉडर्न के साथ साथ  नए नए इनोवेशन प्रैक्टिकल करके बेहतर ब्रांड मार्केट में लेकर आ रही है।  सेवा भाव से लगे सेवकों का कहना है कि श्रमदान  से बने ब्रांडेट कपड़े अनुकूलता कि दृष्टि से क