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Showing posts from June, 2019

विज्ञापनों से हिंदी को बढ़ता खतरा

विज्ञापन की भाषा सरल और सटीक होती है। इसमें भाषा के शब्दों को तोड़ मरोड़ कर पेश किया जाता है। विज्ञापन की भाषा में भाषा की कृति और गुण को ध्यान में नहीं रखा जाता । हिंदी के स्कूलों में पढ़ाई जाने वाली भाषा के विज्ञापनों में अंग्रेजी शब्दों का उपयोग किया जाता है जैसे स्कूल चले हम! भारत की शिक्षा का नारा है जबकि हमारे बच्चे इंग्लिश कम ही पढ़ पाते हैं।फिर भी यह संगीत रूप में  बच्चों को याद है।बच्चे अब हिंदी का विद्द्यालय शब्द भूल गए । हम अपनी मुख्य भाषा को छोड़कर अन्य भाषा का उपयोग ज्यादा कर रहे हैं। हिंदी के अतिरिक्त  उर्दू ,अंग्रेजी  शब्दों का  तोड़ मरोड़ कर उन्हें मिलाकर प्रस्तुत किया जाता है क्योंकि विज्ञापन में स्थान कम रहता है। मीडिया के बदलते दौर और माध्यमों ने भाषा को भी कार्टून बना दिया ।भाषा को कार्टून की तरह उपयोग किया जाने लगा । टीवी पर प्रदर्शित होने वाले विज्ञापनों में अपार संभावना मौजूद है।  विज्ञापन एक रचनात्मक माध्यम है जिसमें दृश्य ,श्रव्य, रंग तथा गति और संगीत  संयोजन से विशेष प्रभाव उत्पन्न किया जाता है ।विज्ञापन के विशेष प्रभाव के कारण इसका भाषा पर अधिक प्रभाव पड़ता ह

जल से जूझता भारत ,मंडरा रहा सूखे का खतरा

दुनिया आज जल के संकट से जूझ रही है ।भारत भी इससे अछूता नहीं है। जीवन की उत्पत्ति  ही जल में हुई है ।तभी कहा जाता है जल ही जीवन है ।जल के बिना जीवन जीना संभव नहीं है ।जन जन को जल की जरूरत है ।भीषण गर्मी में जल स्रोत सूखने से जनता पानी को तड़प रही है।जल संकट से जुड़ी खबरे देश के कोने कोने में देखने को मिल  रही है। देश जल संकट की चपेट में है । पूरे देश पर सूखे का खतरा मंडरा रहा है ।पानी पाने की जद्दोजहद में कहीं कहीं  जगह झगड़े भी हो रहे। जन की जल पर जंग जारी है ।लोहे को जंग से नष्ट करने वाले  जल पर जन एक दूसरे की जान लेने को उतारू हो  गए है। पहले पानी के स्रोतों पर ध्यान केंद्रित नहीं किया गया।असीमित मात्रा में अनावश्यक उनका दोहन किया गया ।फिजूल में जल की  बर्बादी की  । धीरे धीरे जल संकट  ने  विकराल रूप  ले लिया ।तपते वातावरण, ऊपर से पीने के  पानी की कमी में  जनता का जीना दुर्बल हो गया है। भीषण गर्मी में लाखों जीव जंतुओं की जाने चली गई।  जानो का यह सिलसिला कब  थमेंगा पता नहीं । मानव के साथ साथ पक्षी जंतु एक एक बूंद को तड़पते हुए बिलख रहे है । कुएं तालाब नदियां सूखी पड़ी है ।डैम दम तोड़ते दिख 

विश्व पर्यावरण दिवस

रेत,खेत की जोतें सड़क पर मौतें पृथ्वी की बढ़ती तपिश से कई नदियां सूख गई और कई सिकुड़ते हुए सिमट रही है।उस पर निर्भर जीवों का जीवन भी पानी की कमी में सिमटता जा रहा है । संकट की घड़ी में खुद पर मंडराता खतरा दूसरों के लिए भी खतरा बन गया है। सूखे की मार विश्व में इसका संकेत है ।अरबों जीव जंतुओं का टैटूआं सूखा पड़ा है। प्यास की तड़प में पौधे और जन्तु विलख रहे है। अपनी आवाज उठाने में असमर्थ असक्षम पौधे और जंतु प्रकृति और मानव की दोहरी मार झेल रहे हैं। पृथ्वी का सबसे बुद्धिमान प्राणी होने के नाते मनुष्य ने अपने सुख और सुकून की खातिर वृक्षों को काटा, हटाया,घर की दीवारों में चिनवाया,आरी की धार चलवाई और फर्नीचर में जड़ दिया,जरूरत नहीं रही तो जलवा भी दिया,ठूंठ ठूंठ तक नहीं छोड़ा। विकास की तेज दौड़ और होड़ में जंगल खत्म कर दिए। प्राणियों को शुद्ध हवा और भोजन देने वाले। आज खुद अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं कुछ प्रजातियां तो इस अस्तित्व की लड़ाई में विलुप्त हो गई ।वे जड़े  खत्म हो गई जो मिट्टी को बांधने में सक्षम थी।विकास की दीवारें ,चादरें बनाने में रेत की जरूरत पड़ी तो नदियों में उतरे। मशीनों ने न

बुखार वातवरण का

लू की लपेट से बचे बढ़ते जलवायु परिवर्तन से तापमान में बेरुखी बदलाव देखने को मिल रहे है ।फिर बात चाहे कहीं की भी हो । ताप की तपस ,शीत का कहर ,बरसात में  बाढ़ो की मार और लपटों के थपेड़ें  मानव को  झेलने पड़ रहे है ।उसे इनसे सामना करना स्वभाविक है क्योंकि इन सब का जिम्मेदार भी वह खुद है ।समुद्र किनारे बसे केरल को हर साल  किसी ना किसी प्राकृतिक आपदा का सामना करना पड़ता है ।135 सालों के इतिहास में इस राज्य ने  अनेक बार बाढ़ ,सूखे की मार झेली है ।साथ ही कई बार शीत लहरों के प्रकोप के साथ 20 से ज्यादा बार लू की चपेट में आया है। है ।कई लोगों को लू ने कोमा में पहुँचा दिया तो कईयों के सिर और कंधे झुका दिए । गर्म हवायों से शरीर का निर्जलीकरण का होना आम बात हो गयी है ।सरकार ने इससे बचने के लिए एक कदम बढ़ाया ।सुबह 10 बजे से 3  बजे तक  घर से बाहर ना निकलने की हिदायत दी है । देश के दिल में बसा  मधयप्रदेश भी  मौसम  में मासूम हो जाता है ।बरसात के मौसम में बारिश नहीं होती । सर्दियों का अंतराल बर्ष दर वर्ष बढ़ रहा ।और ठंड में बेमौसमी बरसात तो गर्मियों में ताप का पारा आसमान में पहुँच जाता है ।चिलचिलाती धूप  की