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Showing posts from April, 2019

तीन सांसद मुरैना से पहुंच सकते है संसद

इस लोकसभा चुनाव में मुरैना से तीन सांसद जीतकर संसद पहुंच सकते है इससे पूर्व भी दो सांसद जीतकर दिल्ली पहुंचे थे दोनों ही सांसद  भारतीय जनता पार्टी के थे । बाद में एक सांसद ने सरकार में कैबिनेट मंत्री की भूमिका भी निभाई, बड़े कद्दावर के नेता होने से  उनका क्षेत्र में काफी प्रभाव है । पूर्व में भाजपा का गढ़ रहा मुरैना अबकी बार के विधानसभा चुनाव में भाजपा शून्य पर आकर समेट गई और  प्रदेश में भाजपा सत्ता से दूर सरक गई । क्षेत्र में अपना प्रभाव फिर से पाने के लिए भाजपा ने यहां के तीन प्रत्याशी अलग अलग लोकसभा सीट से  चुनावी मैदान में उतारे है । जिनमें मुरैना से  कद्दावर नेता केंद्र सरकार में मंत्री रहे नरेंद्र सिंह तोमर, भिंड से प्रदेश  महिला आयोग सदस्य  रही अनुसूचित जाति की बड़ी नेता संध्या राय, वहीं खजुराओं लोकसभा सीट से  भाजपा संगठन व संघ के नजदीकी विष्णुदत्त शर्मा  चुनावी  मैराथन में शामिल है। कांग्रेस ने भी कोई कोर कसर नहीं छोड़ी  मुरैना से रामनिवास रावत , भिंड से देवाशीष जरारिया दोनों मुरैना जिला से आते है। भाजपा का गढ़ रही खजुराओ  सीट पर बाहरी प्रत्याशी का विरोध हो रहा है। ब्राह्मण बहुस

कुपोषित विकास

डरा -सहमा,बेखबर, बेहद कमजोर,ठिठुरता हुआ  सीधा- साधा बच्चा जिसके रूखे बाल, सूखे होंठ, बहते हुए नम आंसू और कोमल  मुट्ठियों की गुहार  विकास की आड़ में धरी रह जाती है। उसकी जिंदगी के पैरो ने विकास की चकाचौध में घुटने मोड़ दिए। दो वक़्त की रोटी और महगांई का विकास इन नन्हें परिंदों को भिक्षावृत्ति,ठेला ढोना, ढाबों पर बर्तन धोना जैसे  बालश्रम करने को मजबूर कर देता है बालश्रम बच्चों के लिए निशुल्क शिक्षा का लक्ष्य यहां ढ़ेर हो जाता है । शिक्षा की टांगे अकड़ी हुई इन बच्चों को विकसित समाज आइना दिखाकर दुत्कारता है।नंगे बदन डर से कांपते हुए बालश्रम बच्चों का भविष्य रोजगार, समाज और परिवार से जुड़ा मुद्दा है जो हमारे  कुपोषित सामाजिक विकास को दर्शाता है।देश की दो तिहाई भूमि आज भी असिंचित है। साल दर साल जमीनी पानी का स्तर लगातार गिर रहा है ।देश के कई इलाके सूखे की मार झेल रहे है जहां पीने का पानी उपलब्ध नहीं है। सरकार आज भी रिवर्स ऑस्मोसिस से समुद्रीय पानी को पीने योग्य करने का प्रबंधन नहीं कर पाई । जबकि विश्व बैंक रिपोर्ट ने खुलासा किया है जलवायु परिवर्तन का असर भारत पर अधिक पड़ेगा।2050 तक देश की आध

खामोशी में खुशी कहां

खुश रहो , खामोशी भगाओ खामोशी  में खुशी  सो जाती है । किसी की खामोशी दर्द भरी होती है तो किसी की खामोशी दर्द भरी पीड़ा के कारण होती है ।खामोश होना अच्छी बात है तभी तो कहा गया है अच्छा श्रोता एक अच्छा वक्ता होता है । लेकिन खामोशी को  हमेशा अपने जिंदगी में बनाए रखना , जो फितरत बन जाए । इसकी वजह अनेक हो सकती है किसी की चिंता और किसी कारण से चिंता , चिंता की लकीरें उस खामोशी को प्रदर्शित कर देती  है । और यही चिंता  खामोशी का रूप लिए  दीमक की तरह मनुष्य ओर उसे अमूल्य  जीवन को खत्म कर देती है ।किसी के अत्यधिक चाहने वाले का दूर होना और अधिक लगाव वाले का इस दुनियां से परलोक गमन भी उसकी याद जिस पर वो अधिक विश्वाश उस पर निर्भरता गम में डूबा देती है , निर्भर व्यक्ति मन ही मन ये सोचने लगता है अब उसका क्या होगा , यहीं सोचकर वह अपने ख्यालों में खोया रहता है तथा सब से बाते, चर्चा  करना बंद कर देता है उसका यू खामोश होना समाज से दूरी बनने का जरिया बन जाता है । समाज से दूरी सामाजिक विकार को जन्म देती है । विकार से पीड़ित  अकेलेपन का एहसास कराता है जहां वह अंदर ही अंदर दर्द को छिपाने लग जाता है जिंदा दर

घर की मालकिन, सत्ता की मालकिन बने

सत्ता में बढ़े नारी शक्ति लोकतंत्र पर्व मनाते मनाते करीब 70 साल गुजर गए । इतने साल निकल जाने के बाद भी सत्ता के गलियारों में चिंतित नारी सहमी,डरी, छिपी हुई  बैठी  है। इनकी चिंता सत्ता में बैठे नेताओं को नहीं होती?जो चिंता हुई वह आरक्षण के फंदे में फंस गई या फंसा दी गई। आजादी के समय हमारे संविधान निर्माताओं ने नारी को अधिकार पुरुष समतुल्य ही दिए । फिर  क्यों, और कैसे,इस पल्लू के छोर से सत्ता को भांपने वाली शक्ति  नारी ने घर की रसोई में उठने वाले धुएं से खांसते- खांसते ,घुटते -घुटते  दम तोड़ दिया और उसका सत्ता की सरकारी कुर्सी पर बैठने का सपना घूंघट में रह गया।कुछ जो पढ़ लिखकर देहरी से बाहर आई ,वो डिग्री लेकर सरकारी कार्यलयों में फ़ाइलो में दब गई । पुरुष प्रधान समाज में शिक्षित,धनवान, सम्पन्न बुद्धिमती नारी शक्ति घर की चार दीवारों का प्रतिनिधित्व करते हुए ,झोंपड़ी और खप्पर में रहने वाली अशिक्षित बेपढ़ नारी साथी के आशियाने पर उनकी  नजर ना पड़ती है, ना टिकती है , ना ठहरती है। ये नारी शक्ति यहीं दब जाती है ,विकास के झूठे पकवानों में।   चुनाव में याद आती है मतदान महिला शक्ति   सत्ताधारियों क

हर गुलामी और साम्प्रदायिकता से आजादी चाहते: माखनलाल

राष्ट्र, मनुष्य और संस्कृति की रीढ़, राष्ट्रीयता : दादा शिक्षा, किसान, कलम  पत्रकारिता की आवाज, रोजगार, आज राजनीति, कॉर्पोरेट संस्थाओं के घेरे में पिस रही है ।इस  पिसते हुए युग में दादा माखन लाल जी की गुलामी से आजादी दिलाने वाली कलम की आवाज आज भी साहित्य में एक नया श्रेष्ठ मार्ग प्रदान कर रही है । इस साहित्य मार्ग पर नए भारत को चलकर दुनियां में अपना नाम शीर्ष पर दर्ज करना होगा। अन्न नहीं है ,फीस नहीं है, पुस्तक है ना सहायक है हाय, जी में आता है पढ़-लिख लें, पर इसका है नहीं उपाय । कोई हमें पढ़ाओ भाई , हुए हमारे व्याकुल प्राण , हा!हा! यों  रोते फिरते हैं भारत के भावी विद्वान। युगपुरुष माखनलाल चतुर्वेदी स्वतंत्रता संग्राम के हरावल दस्ते के नायक,अद्भुत वक्ता,निष्कलुष राजनेता,कालजयी कवि, हिन्दी के ऐसे विरल योद्धा पत्रकार-संपादक और ऐसे साहित्यकार जो कर्म से योद्धा और हृदय से कवि रहे हैं। माखनलाल चतुर्वेदी एक ओर मातृभूमि की सेवा भावना से अभिभूत थे तो दूसरी ओर हिंदी भाषा के स्वरूप निर्धारण के लिए चिंतित, क्रांति में समिधा बनकर निरंतर अपने को होम करके, पीढ़ियों पर छाप डालकर भी युग के पार्