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Showing posts from December, 2019

धर्म निरपेक्षता पर कलंकित कानून :CAA

CAA धरनिरपेक्षता मुस्लिम धर्म के अन्याय के साथ पूरी मानव सभ्यता को काले धर्म के चश्मे से देखती है वो एब ओरिजिनल भूसुर प्रकृतिवासी प्रेमी जिसका धर्म से दूर तक कोई वास्ता नहीं है ।प्रकृति से जुड़ाव ही उसका धर्म है ।जिससे सभी धर्म उपजे , पैदा हुए है। कानून में शामिल सभी धर्म उसे अपने धर्म में शामिल  करने का कठोरतम अन्याय करेगें।स्वार्थी दुनिया को  ना समझने वाला ये आज का आदिवासी जंगलवासी  का प्रकृति धर्म इस्लाम देशों में भी अकंलकित है।इन मूलनिवासी वनवासी आदिम जनजाति  आदिमानव का जीवन आज भी सभी धर्मों को सीखने का एक मार्ग प्रद्दत कर रहा है।इनके  सभ्य समाजो से ही बदलते दौर के साथ  सभी धर्म डले है।समयानुसार संबृद्ध सम्पन्न धर्म अपने मानक पैमानों  और व्यवस्थाओं में इन्हें पिछड़ा समझ रहे है ।मॉडर्न मानव इन्हें अधर्मी कहे या नास्तिक ।ये मॉडर्न मानव की संकीर्ण सोच और धर्मस्वार्थी भावना को व्यक्त करता है । जंगलवासियों बनेंगे धर्मवासी :CAA

पंचायतों को मिले स्पेशल पॉवर

पंचायती राज शासन का विकेन्द्रीयकरण सुनिश्चित करने की एक व्यवस्था है । आजाद भारत में इसकी शुरुआत 24 अप्रैल 1993 से हुई ।वैसे भारत के प्राचीन इतिहास में पंचायत कीव्यवस्था थी ।संविधान के भाग 9 अनुसूची 11 अनुच्छेद 243 में त्रिस्तरीय पंचायत राज का उल्लेख है । जिस उद्देश्य के साथ इसकी शुरुआत की गई उसे पाने में आज भी पंचायते और सरकार फिसड्डी साबित हुई है ।इसमें ग्राम पंचायत ,ब्लॉक,जिला स्तरीय पंचायत शामिल है ।पंचायत उन शक्तियों का उपयोग कर सकती है जिन्हें राज्य विधानमंडल बनाएगा। इसलिए  पंचायत शासन व्यवस्था का हिस्सा होते हुए भी राज्य सरकार की वैसाखी के भरोसे  चलना पड़ता है । यदि पंचायतों के द्वारा ग्रामीण विकास को बुलेट रफ्तार से दौड़ाना हो तो उन्हें स्पेशल पॉवर देने की जरूरत है ।जिनमें बीमार स्वास्थ्य सेवाओं सुविधाओं का कारगर इलाज और नागरिकों की देखभाल ।स्वास्थ्य व्यवस्था और सेवाओं में सुधार करना है तो गांधी के ग्राम स्वराज के मॉडल को अपनाना होगा।ताकि हर गरीब तबके को सुविधाओं  का लाभ मिल सके। इसके अंतर्गत स्वास्थ्य सेवाओं के क्रियान्वयन की जिम्मेदारी और अधिकार पंचायती संस्थाओं को सशक्त बनाकर द

बच्चे बोलते है?

बच्चें किसी देश के विकसित भविष्य के पेड़ का वो बीज होता जो जितना स्वस्थ होगा पेड़ भी उतना विकराल रूप लेगा।विकसित भारत के बीज बच्चें गर्भ से लेकर जब तक समझने योग्य नहीं बन जाते तब तक पीड़ा समस्या झेलते रहते  है ।कभी कभी तो माँ के गर्भ में झेली पीड़ा जिंदगी भर झेलने पड़ती है ।प्रैग्नेंसी के दौरान रोगों की समस्या मां और बच्चे दोनों के लिए घातक होती है । रोगों से मुक्त करना स्वस्थ रखना उनकी सुरक्षा करना समाज सरकार की जिम्मेदारी है और उसका जीने का अधिकार भी ।एक स्वस्थ जन समाज और देश  के विकास के लिए काम करता है। अस्वस्थ आबादी के साथ कोई देश विकास का सपना नहीं  देख सकता । सरकार उच्च कुपोषण को छिपाकर विकास के पैमाना का कद जरूर बता सकती है।  दूर गांव में पिछडे क्षेत्रों में सेहत सेवाएं  गायब  है ।हम मातृत्व मृत्यु दर  बाल मृत्यु दर कुपोषण में सबसे ऊंचे पायदान पर है।गरीबी अशिक्षा कुपोषण के चलते गरीब लोग शहरों के बड़े बड़े अस्पतालों की दहलीज़ पार करने की हिम्मत नहीं जुटा पाते।पैसा ना होने के कारण पीड़ा को सहते हुए झाड़ फूंक करने स्वयम्भू नीम वैध की शरण में जाकर आगे का भविष्य भाग्य भरोसे ईश्वर पर छोड़ देते

बिगड़ती अर्थव्यवस्था का जिम्मेदार पश्चिमी अर्थव्यवस्था

गुलामी से आजादी मिलने के बाद भारत के भाग्य में  भूख मिली और हाथ में गरीबी । स्वंत्रत भारत पंचवर्षीय  योजनाओं से विकास की रफ्तार पकड़ ही रहा था कि दुनिया में पूंजीवाद निजीकरण व्यक्तिगत पाश्चत्य अर्थव्यवस्था ने वैश्वीकरण के नाम पर विकास की पटरी पर चलने की शुरुआत करने वाले गरीब देशों में अपनी अर्थव्यवस्था थोंपने का काम किया ।इसमें भरपूर सहयोग दिया विदेशों से संचालित होने वाले  मीडिया माध्यमों और उनके अधीन कार्य कर रहे मीडिया कर्मियो ने ।जब ये दौर फूल की तरह खिलने वाला था ।तब भारत जैसे देश की बैलगाड़ी वाली मजबूत स्थायी  अर्थव्यवस्था  जो पर्यावरण के अनुकूल भी थी को  इन भौंकने वाले माध्यमों ने धीमा और बेहाल  बताकर पाश्चात्य अर्थव्यवस्था को अपनाकर राजनीतिकरण कर निजी हाथों में समेटने का प्रयास किया ।  इन हाथों की अंधाधुंध काली कमाई विदेशों में जाती रही ।इसमें यहां के संसाधनों का भरपूर दोहन किया जाता रहा । मीडिया का प्रचार महानगरों शहरों तक खूब हुआ। विज्ञापनों से शहरों में बिक्री बढ़ी रोजगार के चलते  गांव  के गांव शहर में बस गए ।जिससे गांव का रोजगार ,ग्रामीण अर्थव्यवस्था धाराशायी होती चली गई। गांव

आधुनिक भारत के राष्ट्रपिता डॉ अम्बेडकर का महापरिनिर्वाण दिवस

विश्व की महान विभूतियों में शामिल युग प्रवर्तक डॉ बाबा साहब भीमराव अंबेडकर ने  विश्व के बदलते वातावरण में एक नई आर्थिक नीति के माध्यम से सामाजिक व आर्थिक क्रांति को विश्व पटल पर रखा।1931 के गोलमेज सम्मेलन में श्रमिक भारत के करोड़ों दलितों की सामाजिक एवं आर्थिक दुर्दशा का चित्र ,अंग्रेजी शासकों से अधिकार हासिल करना ,उनकी निर्भीकता योग्यता को बताता है । श्रमिक एकता क्रांति के सूत्रधार बने डॉक्टर अंबेडकर ने व्यावहारिकता के अनुरूप पूंजीवाद एवं सामंतवादी व्यवस्था में श्रमिकों को मुक्ति दिलाने के लिए राज्य समाजवाद की ओर समाज को मोड़ा और एक नया रास्ता दिखाया । जो डॉ अम्बेडकर की सामाजिक आर्थिक क्रांति की आधारशिला है। व्यवहारिकता के पक्ष में मानवीय मूल्यों को सर्वोपरि बताया । महान अर्थशास्त्री डॉ अम्बेडकर ने शुद्ध आर्थिक क्रांति से कई अधिक मानवीय मूल्यों को ऊपर उठाने के लिए सामाजिक बदलाव को जरूरी समझा और आर्थिक प्रजातंत्र की वकालत करते  रहे।  संविधान सभा के समक्ष अपना स्पष्ट विचार रखते हुए डॉ आंबेडकर ने कहा था 26 जनवरी 1950 को हम विरोधाभास के जीवन में प्रवेश कर रहे हैं एक तरफ राजनीति में समानता

भोपाल गैस त्रासदी की पीड़ा के पैंतीस साल

भोपाल गैस त्रासदी 3 दिसम्बर 1984  आधुनिक युग की दुनिया के इतिहास में काली परेड के यूनियन कार्बाइड कारखाने द्वारा कीड़े मकोड़ों को मारने वाले रसायन मिथाइल आइसोसायनाइड के खौफनाक रिसन से भोपाल गैस त्रासदी काले पन्नों में दर्ज हुई है । दुर्घटना गैर जिम्मेदारी, लापरवाही, लोभ,लालच और अनदेखी का परिणाम था। जिसका खामियाजा निर्दोष नागरिकों बच्चों और महिलाओं को भुगतना  पड़ा, आज भी पीड़ा का यह सिलसिला जारी है। यह सब छोटी कमियों का कमजोर विश्लेषण ,प्रबंधन और सुरक्षात्मक उपायों की कमी थी। जो सावधानियां बरतनी थी वे सावधानीपूर्वक नहीं बरती गई । टैंक E 610 में मापदंड के अनुमान 50% (30 टन)से अधिक 75%(45टन) मिथाइल आइसोसाइनेट गैस का भरना और उसे रखना लालच और साजिश को दर्शाता है ,रखे होने से गैस दूषित हो गई ,साथ ही टैंक में पानी और जंग की पपड़ी चले जाने से पॉलीमराइजेशन की क्रिया शुरू हो गई थी जिसके कारण तापमान  व दबाव खतरे के निशान से कई गुना बढ़ गए, जिसकी वजह से मिक का  द्रव गैस में परिवर्तित हो गया ,गैस बनने के कारण टैंक में दबाव और अधिक बढ़ने से गैस बाहर आने लगी ,इस खतरे की सूचना देने के लिए जो  मापक

त्रासदी का दंश कब तक झेले पीड़ित

कहा जाता है पीड़ित को जानना समझना हो तो उसकी पीड़ा को महसूस कीजिए ।रोगी के रोग का इलाज कीजिये उसकी सेवा कीजिए ।वह आपसे  जरूर प्रभावित होगा इंसान को इंसानियत के नाते  ये सेवा जरूर करनी चाहिए ।बीमारी का बोझ झेल रहा रोगी सेवा करने वाले को दुआएं जरूर देगा ।ये दुआएं उसकी अंतरात्मा से निकली होगी ।राजधनी भोपाल में स्वास्थ्य समस्याओं  के साथ लाखों लोग मौत से जूझ रहे है। जिसकी वजह 35 साल पहले हुई खौफ़नाक गैस मिक (मिथाइल आईसोसायनाइड ) बनी हुई है।पेस्टिसाइड बनाने वाली यूनियन कार्बाइड फैक्टरी  जिसने लाखों लोगों को  निगल लिया ।दुर्घटना के कारण फैक्ट्री का काला पड़ा चेहरा आज भी राक्षस की तरह इलाके की जनता को खा रहा है।यूका का जमीन में  जमा कचरा जिसका सरकारें अब तक निराकारण नहीं कर पाई है वह कचरा जल जमीन हवा को अभी भी दूषित कर  रहा है ।कचरे के निराकारण में नाकाम रही सरकारें आखिर पीड़ितों की पीड़ा समझने में आनाकानी करती नजर आती है। देश के दिल के फेफड़े कब तक इस जहरीली हवा को अपने अंदर भरते रहेंगे ।तालाबों के शहर भोपाल में कब से पीड़ित लोग दुषितरहित साफ पानी पियेंगे। आखिरकार जब तक लोगों को बेहतर स्वास्थ्य स