पांच चार 999 लॉक डाउन दीये की अंधमय रोशनी !एक सोच

किसी के कह देने मात्र से  उसे बिना बुध्दि तर्क विज्ञान की कसौटी पर परखकर, कर देना गूंगापन अंधापन बहरापन के साथ पागलपन को व्यक्त करता है ।कल रात 9 बजे 9 मिनिट हम सब वो करने जा रहें ।केवल इसलिए कि  नाटकीय भाषा से रिझाने वाला प्रधानमंत्री अवैज्ञानिक और अंधविश्वासी राह   पर छोड़कर तकनीकी सर्वसुविधायुक्त  सुविधाओं से ध्यान हटा सके ।और दुनियां के सामने अपना एक  झंडा गाड़ सकें और  शान से इसे अपने पक्ष में प्रस्तुत कर दे ।कि  देखो मेरी मूर्खता भरी  तर्को से दूर आवाज पर भी करोड़ो लोगो ने ताल ताली थाली घण्टी घण्टा शंक बजाने के साथ दिए जलाए ।धर्म के तीज त्त्यौहार पर्व मनाने में इनका अपना अलग महत्त्व है । इस पर लगा  प्रश्न  चिह्न अलग विवाद का विषय है । लेकिन कल जलाने जा रहे  करोड़ो दीपक का कुछ भी  राष्ट्रहित नहीं है ।बल्कि नुकसान है जिसे केंद्रीय मंत्रालय के साथ कई राज्य सरकार  स्वीकार कर चुका है ।क्योंकि अधिक लाइट स्विच ऑफ होंगे तो कई स्थानों पर फॉल्ट होने की संभावना होंगी ।कई बिजली कंपनियां के साथ इलेक्ट्रिक मैन इसे देश के लिए बहुत बड़ा खतरा बता रहे है ।जिससे कोई भी बड़ी दुर्घटना होने कि संभावना है । भले ही दुर्घटना टल जाए पर इससे इंकार नहीं किया जा सकता  रही बात दीपक दिए मोमबत्ती जलाने की तो वो सब खुशी में जलाते है ।शायद देश के वक्त की धड़कन भी इस समय  डरी परेशान कौंधती हुई थमी थमी सी नजरमहसूस हो रही है ।महापुरुषों तपस्वी महान मनीषियों की भूमि है जिससे कोरोना जैसी महामारी ने अभी वो रूप नहीं दिखाया है जैसा इटली और अमेरिका में।परंतु ये हम कैसे कह सकते है जबकि हमारे यहाँ जांचे ही रेंगती हुई कातर की तरह हो रही है । दूसरी तरफ जब वैश्विक आर्थिक संकट पैर पसार चुका है इसमें हम कहाँ है आप जानते है ।पहले से भारत ही अर्थव्यवस्था सिमट के धरी हुई है । आर्थिक आंकड़ा का मोटा मोटा  अनुमान लगाया जाए यदि 20  करोड़ परिवार ही दीपक जलाएं तो उसका क्या बजट होगा। एक दीपक 1 रुपये ,दीपक में तेल वो भी एक रुपए ,बाती वो भी एक रुपये ।सोचो कितना बर्बाद करने जा रहे है अरबों रुपये ।मिलेगा क्या सिर्फ वो 9 मिनिट का प्रकाश जिसके बाद फिर अंधेरा । पर्सन टू पर्सन दूरी टूटने की  असावधानी ।इतना नुकसान जबकि भूख से बिलखता  देश शिविरों सड़को पर पड़ा है । जबकि 19 वी सदी के महान विभूति किसान गरीबों निर्धनों भूखों के  चिंतक माखनलाल चतुर्वेदी जी ने कहा था  अंधकार उन्हें शक्ति देता .. अंधकार में ही विश्वमाता सृजन-साधना रहती ... प्रकाश उसकी चिर समाधि को तोड़ता है। 'वे अंधकार की देन में लिखते हैं - मैं कैसे कहूं ,अंधेरे ने मुझे कितना दिया है? लगता है जैसे उजाले ने मुझसे लिया ही लिया है मानो दिया कुछ नहीं है।' वो अंधकार में रमते और कहते  बाहरी प्रकाश की जरूरत नहीं ।वो अंदर के दीपक को जलाने चाहते थे जो सदैव साथ में जलता रहे ।मार्गदर्शक गौतम बुध्द भी विचार बुद्धि तर्क वैज्ञानिक सोच समय और ह्रदय के दीपक को जलाने की प्रेरणा देते रहे ।जो अपने साथ साथ अन्यों को भी मार्गदर्शक दे सकें ।अब ये आपको तय करना है कौन सा दीपक आपको जलाना है ।


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