तकनीकी रूप से पश्चिमी कल्चर से आया जेन जी शब्द, प्रचार में क्यों पड़ रहा है भारी, तत्काल इस पर लगे रोक

भारत की राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के जंतर मंतर से लेकर आदिवासी राज्य झारखंड की राजधानी रांची में युवा छात्रों के प्रोटेस्ट को जेन जी प्रोटेस्ट कहना कितना उचित है?। पश्चिमी संस्कृति से उपजा जेन-Z साहित्य और संस्कृति के जरिए दुनिया में छाप छोड़ने भारत में कितनी तेजी से फैला, इस पर सोचने की जरूरत है। 


क्या हम राजनीति के चक्कर में अपनी ही संस्कृति की छवि को धूमिल कर रहे है, या कम आंक रहे है। मीडिया के प्रचार और सियासी हमले में हमारे अपने ही नेता अपनी संस्कृति का मूल्यांकन या तो सही से नहीं कर रहे या अपने सियासी चश्मे से कम कर रहे है। 

हमारी अपनी भारतीय संस्कृति में तो युवाओं को नहीं पूरे जीवन काल को बांटा है। फिर हम युवाओं को क्यों श्रेणियों में तोड़ रहे है। नई तकनीक और उनके इस्तेमाल का दौर आता -जाता है।  लेकिन क्या राष्ट्र की भविष्य शक्ति युवा को विभाजित करना कितना सार्थक है, ये आप सोचिए। कई हम अपने देश की युवा शक्ति को गलत शब्दों और सियासी चश्मे में बांटकर और तोड़कर उसे दिग्भ्रमित तो नहीं कर रहे। 

कई स्टूडेंट जिनमें ढंग से सोच विकसित भी नहीं हुई होती, वो राजनीतिक छात्र संगठनों के चलते अपने जीवन को चौपट कर चुके होते है।  कुछ नेता बन भी जाते है,  प्रसिद्धी भी पाए जाते है, लेकिन असली शिक्षाविद व वरिष्ठ अनुभवी शिक्षक और विशेषज्ञ राष्ट्रहित और छात्रहित को ध्यान में रखकर यही कहेगा, छात्र जीवन में पॉलिटिक्स से दूर रहे। 

नेपाल और बांग्लादेश में वहां की सरकार ने अपने युवाओं को हिंसा के तौर पर प्रचार कर ,विश्व में गलत छाप छोड़ी। सत्ता बदली लेकिन आखिरी रास्ता तो मतदान से ही निकला , भारत में युवाओं की हिंसात्मक संस्कृति नहीं है। छात्र जीवन की सियासत से लेकर संस्कृति तक जो नई परिभाषा गढ़ी जा रही है, उस पर भारत में आज विचार करने की अधिक जरूरत है। अन्यथा आगामी समय में इसके गंभीर दुष्परिणाम हो सकते है। जैसे भारत में कुछ भी करने की एक पार्लियामेंट प्रोसेस है, वह सड़क और सोशल मीडिया से तय होने लगेगी। सरकार मजबूर होगी लेकिन छात्र जीवन संकट और भ्रमित में होगा। 

हम अपने जीवनकाल की श्रेणियों को भूलकर जेनजी कहकर अपने ही युवाओं का एक गलत तरीके से गाली दे रहे होगे। इसमें एक हिंसात्मक और प्रदर्शनकारी सोच छुपी होगी। 

भारतीय  सामाजिक व्यवस्था और संस्कृति में मनुष्य के पूरे सौ साल के जीवन काल को चार भागों में विभाजित किया गया है। इन्हें 'चार आश्रम' कहा जाता है।  ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और सन्यास हैं।

ब्रह्मचर्य

जन्म से लेकर 25 वर्ष तक के जीवन को ब्रह्मचर्य आश्रम में रखा गया है, जिसका उद्देश्य ज्ञान और शिक्षा ग्रहण करना है। गुरु या अच्छे आचरण वाले व्यक्ति के पास रहना, उनसे अनुशासन सीखना और  ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए शरीर को मजबूत बनाना। 

गृहस्थ

दूसरी अवस्था  गृहस्थ आश्रम में 25 से 50 वर्ष तक के जीवन को रखा गया है, इसका उद्देश्य घर परिवार और समाज की जिम्मेदारी संभालना। विवाह करना, धन कमाना, संतान पैदा करना और सबका ध्यान रखना। 

वानप्रस्थ 

तीसरी अवस्था वानप्रस्थ में 50 से 75 साल तक के जीवन को कहा जाता है, इसमें मोह-माया और घर-बार से धीरे-धीरे दूरी बनाना, समाज सेवा करना और उसको बढ़ावा देना शामिल है, इसमें युवा पीढ़ी को सलाह देना और धार्मिक  भक्ति को महत्व दिया गया है।

सन्यास 

जीवनकाल की आखिरी अवस्था सन्यास आश्रम में 75 से 100 आयु तक के जीवनकाल को रखा गया है। इसके अंतर्गत मनुष्य को ध्यान लगाकर शांति से रहना चाहिए। 

आपको बता दें वो दौर अलग रहा होगा जब मानव जीवन को इस तरह की जीवन काल अवस्थाओं को बांटा गया था। तकनीक से बदलते सामाजिक आर्थिक सांस्कृतिक और राजनीतिक जीवन के बदलते परिदृश्य में मनुष्य की शिक्षा प्रणाली,  उद्देश्य और जीवन में निर्भरता बदलती गई। विकास की भागती दौड़ में मानव को मजबूरी में मशीन और तकनीक पर अधिक निर्भर होना पड़ रहा है। ऐसे में आश्रम अवस्थाओं में भी मिश्रित होने लगा, और उसके समय समय पर उद्देश्य भी बदलते गए। लेकिन फिर भी मानव जीवन की ये चार आश्रम अवस्थाएं श्रेष्ठ ही नहीं सर्वश्रेष्ठ है। पूरे  जीवनकाल की ये आश्रम व्यवस्था , जेन जी जैसे युवा पीढ़ियों के बंटवारे से कई गुना अधिक श्रेष्ठ हैं। जेन जनरेशन की नई परिभाषा के चक्कर में  भारतीय अपनी ही संतान ,युवा और भविष्य की शक्ति को एकजुटता का संदेश दिया बिना बांट रही है। 

भारतीय संस्कृति को ध्यान में रखते हुए सरकार , मीडिया और न्यायपालिका इस शब्द को देश में प्रचारित होने से रोके। 

डॉ आनंद वाणी

वरिष्ठ उपसंपादक दैनिक भास्कर


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