कानून और सजा से नहीं , सिस्टम और शिक्षा प्रणाली के सुधार से पेपर लीक पर लगेगी रोक

देश के प्रधान ने साफ साफ शब्दों में कहा युवाओं की भलाई और भविष्य से ज्यादा जरूरी कुछ भी नहीं हैं। छात्रों के हितों की रक्षा के लिए हर कदम उठाया जाएगा।  युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ करने वाले  किसी भी व्यक्ति को बख्शा नहीं जाएगा। पीएम के इस बयान के बाद पक्ष- विपक्ष के साथ जनता के बीच में फिर से नई बहस शुरु हो गई। 

छात्रों के प्रदर्शन में लोकतंत्र की रक्षा करने वाली खाकी की लाठी देश के भविष्य पर वार कर रही है। जिस लाठी को लड़कियों की सुरक्षा में वार करना चाहिए था, वह देश को शर्मसार करने वाली हरकत कर रही है। आज सरकार को तो शर्मिंदा होनी चाहिए, लेकिन उससे पहले उस खाकी को शर्म से डूब मरना चाहिए जो सिविल ड्रेस की आड़ में बदनाम हो रही है। जिस खाकी को रक्षा करनी थी, वह माथा फोड़ रही है, सड़क पर भारत के भविष्य को घसीट रही है, दौड़ा रही है। और सरकार संवाद करने के इंतजार में मौन खड़ी है। राजनीति की आड़ में ही सही युवा छात्रों की मांगों को प्रोटेस्ट से पहले ही बात मान लिया जाता, या उन्हें अब दिया जाने वाला आश्वासन को सरकार पहले ही दे देती तो प्रदर्शन पुलिस पिटाई और पॉलिटिक्स शुरु ही नहीं होती, लेकिन सरकार खाकी की लाठी से छात्रों के प्रदर्शन पर वार -प्रहार करने में जुट गई, वो भी वहां जहां से देश के कानून  बनते है, उन पर विचार होता है, और उनके पालन की शपथ दिलाई जाती है।

चलो छोड़ देते है खाकी को , गरीब स्टूडेंट पर सियासत करने वाले पक्ष-विपक्ष सीजेपी के प्रदर्शन में शामिल होने से इतर सड़क से लेकर संसद तक अपने अपने तरीके से अलग अलग प्रदर्शन करने लगे। क्या ये छात्रों की आवाज को खामोश कराने का नया तरीका है या साजिश । अब तो नौबत यहां तक आ पहुंची है कि संसद के एक ही स्थान पर पक्ष - विपक्ष आमने सामने धरना प्रदर्शन कर एक दूसरे को खरी खोटी सुना रहे है, लेकिन युवाओं की कोई सुनने को तैयार नहीं है।  क्योंकि मामला अब  नीट पेपर लीक से हटकर पूरे एजुकेशन सिस्टम  तक जा पहुंचा। 

मिलजुलकर एक दूसरे के समर्थन से राजनीतिक दलों की ओर से प्रदर्शन की बिछाई गई ये विसात बरसाती मौसम की तरह खत्म हो जाएगी। अब सबसे बड़ा सवाल ये बनता है विपक्ष धर्मेंद प्रधान के  इस्तीफे पर क्यों अड़ गया है। इससे विपक्षी दलों को क्या मिलेगा। विपक्षी  दलों की मांग और प्रदर्शन से दिल्ली के साथ साथ देश के अलग अलग प्रदेशों की राजधानी और शहरों में राजनीतिक दलों के बीच टकराव देखने को मिल रहा है। जिससे जनता को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। विपक्ष मंत्री के इस्तीफे से क्या हासिल कर लेगी। क्यों सड़क से संसद तक इस पर बवाल मचा हुआ है। 

पेपर लीक पर प्रदर्शन की बिछाई गई ये बिसात अब कोर्ट से होते हुए सजा और सरकार के जरिए परीक्षा सिस्टम  और शिक्षा तंत्र के कड़े नियमों तक पहुंचेगी। जो आगामी समय में गरीब परिवार के छात्रों को बेबस करेगी।    

 भले ही छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ करने वाले जिम्मेदार लोगों को बख्शा नहीं जाएगा। पर  फास्ट ट्रैक कोर्ट में उन लोगों की दलील और अपील अनसुनी रह जाएगी, जिन पर कार्रवाई  होगी। इसमें गरीब वंचित और शोषित छात्र पीसेगे। नीट पेपर लीक के मास्टरमाइंड को क्लीन चीट भी मिल गई। क्या छात्रों ने अपने प्रदर्शन में फास्ट ट्रैक कोर्ट की मांग की थी? आखिर बात असली मुद्दे की क्यों नहीं होती, की पेपर लीक ही ना हो। उससे पहले ऐसी परीक्षा ही नहीं हो। जिसके पेपर आउट करने की जरुरत पड़े। हम परीक्षा सिस्टम को इतना कठिन क्यों बनाते जा रहे है , जिसके मानसिक दवाब में आकर हर साल सैकड़ों युवा छात्र सुसाइड कर लेते है। 

यहां आपको मध्यप्रदेश के व्यापम कांड की याद दिलाना एक सही उदाहरण साबित होगा , युवाओं के उज्जवल भविष्य और जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई करने की बात कर रहे है। राज्य के तत्कालीन सीएम ने सैकड़ों छात्रों की मौत के बाद भी इस्तीफा नहीं दिया। इसमें कितने गरीब -किसान- वंचित समाज के बेटा बेटियों की जान गई। तब समाज खामोश रहा।   कार्रवाई के नाम पर तत्कालीन सरकार के किसान पुत्र सीएम की वजह से हजारों छात्रों का जीवन और  पूरा भविष्य बर्बाद हो गया। क्या इस पर कोई रिपोर्ट सामने आई? व्यापम स्तर पर बनी खास लोगों की कमेटी ने हजारों मेडिकल छात्रों को शिक्षा से बेदखल कर दिया था।  सुप्रीम कोर्ट ने भी छात्र हित और भविष्य को ध्यान में नहीं रखा, जबकि इनकी डिग्री पूरी हो गई थी। गलत तरीके से चयन होने की जांच के विलंब के वाबजूद भी असम हाईकोर्ट ने 13 स्टूडेंट के भविष्य और जीवन को देखते हुए डिग्री पूरी होने दी और रजिस्ट्रेशन भी दिलवाया। लेकिन ऐसा मध्यप्रदेश के छात्रों के साथ क्यों नहीं हुआ जबकि उनकी डिग्री पूर्ण हो गई थी, जांच के नाम पर हजारों छात्रों के उज्जवल भविष्य को चौपट करने वाले तत्कालीन सीएम को जेल में होना चाहिए था, वह प्रधान ने  दिल्ली में अपने साथ बुला लिया। देश में जिस सख्त कार्रवाई की बात हवा चलने लगी है,  उसमें गरीब और वंचित वर्ग भी पिसेगा। गरीबों के कल्याण की बात करने वाली सरकार खाकी और कानून के डंडे से गरीबों को ही ना केवल परेशान और पीड़ित करेगी उन्हें पनिशमेंट भी दिलवाई। मध्यप्रदेश के व्यापम कांड पर ये शोध का विषय बन सकता है कि अलग अलग स्तर गठित कमेटी और पीड़ित युवाओं में किस किस वर्ग से थे। आज भी जांच एजेंसियों की अधूरी चार्जशीट, सरकार का रवैया और कोर्ट की अनदेखी लोकतंत्र में अन्याय की पीड़ा है।  कानूनी कार्रवाई के नाम पर ऐसे गरीब छात्रों का 15 साल से अधिक का कीमती समय तो बर्बाद हुआ ही, उनका पूरा जीवन अंधकारमय बना दिया। क्या ऐसा ही दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए प्रोटेस्ट और सरकारी आश्वासन से होगा। 

आपको बता दें आगामी समय में दिल्ली में नीट पेपर लीक के विरोध में हुए प्रदर्शन से शिक्षा तंत्र और परीक्षा के ऐसे अधिकार और कठोर नियम सामने आएंगे जिनसे गरीब परिवार के विद्यार्थी सिर्फ कल्याण के नाम पर सरकार का ठिठोरा पीट सकेंगे। पर असलियत में उनसे नुकसान होगा। जैसे आरटीई और आयुष्मान योजना। दोनों ही गरीबों के लिए है लेकिन इससे क्या नुकसान हुआ। आप सबके सामने है। आरटीई से सरकारी स्कूलों और स्टूडेंट की संख्या कम हुई, प्राइवेट स्कूलों की संख्या बढ़ी, सरकार का पैसा निजी स्कूलों में पहुंचा। स्कूलों के नाम पर राजनीति होने लगी, पर रिएलटी में सराकरी स्कूल, टीचर, स्टूडेंट की स्थिति चिंताजनक और दयनीय हो गई है। आज सरकारी शिक्षा में तीनों की स्थिति बदहाल है। जिस गुरुजी को सेवा के जरिए मार्गदाता कहा जाता था, अधिकार नियमों और निर्देशों ने उसे धीरे धीरे सरकार की राजनीति में एक कमर्शियल टूल  बना दिया है। जैसा यूपी में सामने आया था, कि एक टीचर को भूसा भरने का निर्देश दिया था। 

अब सवाल ये है कि नीट पेपर लीक पर इस बार इतना हल्ला क्यों हो रहा है। क्या यह एक राजनीतिक साजिश का हिस्सा तो नहीं ? तो इसकी गहराई में जाएगे तो यह साफतौर पर नजर आ जाता है। मैं यहां नीट पेपर लीक और युवाओं के प्रदर्शन के खिलाफ नहीं हूं। क्योंकि खबरों के मुताबिक अभिजीत दीपके एक दलित स्टूडेंट है। जब वह अमेरिका से भारत आया था. तब उसके हाथ में डॉ अंबेडकर की किताब हाथ में थी। अंबेडकर को पढ़ने वाला दीपके क्या अंबेडकर को इतना भी नहीं पढ़ सका कि अंबेडकर भारतीय युवाओं को शिक्षा पूरी होने तक राजनीति और प्रदर्शन से दूर रखना चाहते थे। अगर शासन प्रशासन ने प्रोटेस्ट में शामिल छात्रों पर पुलिस प्रकरण दर्ज किया था, तब छात्रों के जीवन और भविष्य का क्या होगा? आपको बता है , दिल्ली पुलिस के पास एनएसए लगाने का अधिकार है। इस पुलिसिया अधिकार से खाकी कितने छात्रों  का जीवन बर्बाद करेगी, फिर ना ऐसे छात्रों को सड़क पर कोई नेता दिखेगा ना कोई उजाला करने वाला दीपक। 

अब आते है प्रदर्शन के पर्दे के पीछे की क्या वजह हो सकती है। जिसके चलते पक्ष-विपक्ष ने मिलकर इसकी विसात बिछाई है। हालांकि इसके हमारे पास पुख्ता सबूत नहीं है। लेकिन भारत के एक वरिष्ठ पत्रकार ने भी ऐसा संदेहा जाहिर किया है। 

आपको बता दें आयुष्मान योजना से जिस सरकारी पैसे को सरकारी अस्पताल और डॉक्टर्स को मजबूत करने में खर्च होना था, वह अब निजी अस्पताल और प्राइवेट डॉक्टर्स की उन्नति कर रहा है।  सरकारी मेडिकल कॉलेज और अस्पतालों की नई -नई और बड़ी बड़ी बिल्डिंग देखकर गरीब जनता अभी खुश हो रही है, लेकिन आपको अंदाज है ये सब पीपीपी मॉडल के नाम पर निजी हाथों में जाएंगे।  तब सरकार इस प्रदर्शन को देखते हुए शिक्षा और परीक्षा के नए और कड़े कानून बनाएंगी। तब गरीब बच्चे यहां तक पहुंच भी नहीं पाएंगे, पहुंच भी गए तो पढ़ नहीं पाएंगे। पढ़ गए तो उनका पास होना मुश्किल हो जाएगा। और पास हो गए तो नौकरी नहीं कर पाएंगे। क्योंकि नौकरी सरकारी हो सकती है , लेकिन निजी (सिविल ड्रेस) हाथों का जो डंडा आज खाकी के साथ दिल्ली में गरीब स्टूडेंट पर चल रहा है, तब नियमों का चलेगा। गरीबों के कल्याण की बात करने वाले राजनीति दलों से सावधान रहिए। यहां आपको यह भी बता दें जो कर्मचारी निजी सेक्टर में काम करते हुए उनके लिए ईपीएफओ के मेडिकल कॉलेज खुल गए है, इनमें सिर्फ ईपीएफओ कर्मचारियों के बच्चे ही पढ़ेंगे। इनमें कोई गरीब बच्चा नहीं पढ़ सकेगा।  निजी मेडिकल कॉलेज की फीस इतनी अधिक है कि मध्यवर्गीय परिवार पढ़ ही नहीं सकेगा। 

मेडिकल फील्ड में अनुभव को ध्यान में रखते हुए अंग्रेजी शासन से ही डिग्री करने में समय को कोई समय सीमा तय नहीं थी,  2014 से इस समय सीमा को सरकार ने 8-10 साल तक निर्धारित कर दिया। ग्रामीण पृष्ठभूमि से आने वाले हिंदी भाषा के गरीब छात्र इसका विरोध नहीं कर सकें।  इसके लिए सरकार ने मेडिकल क्षेत्र की किताबों को हिंदी में किया। लेकिन आज तक एक भी छात्र ने हिंदी में पढ़ाई नहीं की। हर जिले में मेडिकल कॉलेज की तैयारी में जुटी सरकार , प्रोफेसर की भर्ती नहीं कर रही है। निगरानी के नाम पर मेडिकल कॉलेज में प्रशासनिक अधिकारियों की घुसपैठ कर दी। यानि सरकार का हस्तक्षेप शुरु हो गया। कुछ सरकारी मेडिकल कॉलेज को पीपीपी मॉडल में निजी हाथों में दे दिया गया है। चिकित्सा महाविद्यालय और जिले के अस्पतालों में पहले से ही जांच सुविधाएं एनजीओ के हाथों में पहुंचा दी गई है। मध्यवर्गीय परिवारों को यहां कीमत चुकानी पड़ रही है। डेढ़ दशक पहले ऐसा नहीं होता था। जिले तक के अस्पतालों में रेड क्रॉस की कम कीमत में ही वार्ड में भी शानदार सुविधाएं उपलब्ध हो जाती थी। क्या यह आज हो पा रही है? निजी चिकित्सा विश्वविद्यालय खोलने के लिए सरकार सस्ती दरों पर जमीन उपलब्ध करा रही है। यानी सरकार निजी हाथों में स्वास्थ्य सिस्टम को सौंपने का षडयंत्र रच रही है, जबकि बढ़ते विरोध प्रदर्शन के बहाने परीक्षा और कड़े नियमों से गरीब स्टूडेंट को इससे दूर करने की साजिश। मध्यप्रदेश के डिंडोरी में एक सरकारी अस्पताल में मरीज को पानी की बोतल से ड्रिप चढ़ाने का मामला, शव को पीठ पर ले जाना, इलाज के लिए गोद में बैठे बच्चे का मर जाना, मर्चुरी में शवों को चूहे से कुतरना, ये सब घटनाएं याद दिलाती है, कि हमारी सरकारी स्वास्थ्य सेवाएं प्रचार में बढ़िया है। जमीन की हकीकत और सरकार के ऐतिहासिक ऐलान खोखले।

सरकार और विपक्ष पेपर लीक के खिलाफ कड़ी से कड़ी सजा का प्रावधान करने की तैयारी में है। क्यों ना हम ऐसी शिक्षा पद्धति लाने पर विचार करें जिसमें परीक्षा ही नहीं हो, व्यापार के नाम पर बड़े बड़े कोचिंग सेंटर खुल गए है। जो धंधे के नाम पर स्टूडेंट को लूट रहे है। 

 क्योंकि एक परीक्षा के एक प्रश्न से तमाम कोशिशों के वाबजूद लीक की आशंका हमेशा बनी रहेगी। भारत के इस सेंट्रलाइज एग्जाम सिस्टम को विकेंद्रीकृत करते हुए स्कूल में सालभर के मापन से तय करना चाहिए।


लेखक 

डॉ आनंद वाणी

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