चमक- दमक वाले विकास की आंधी में मानव ने एक दूसरे को बनाया नक्सली
आजकल विकसित होने की बयार खूब तेजी से चल रही है, इसमें बयानों की आंधी और स्क्रीन से लेकर अखबार और किताबों के पन्नों की धारदार लेखनी भी तेजी से स्पीड पकड़ रही है कि अब बस हम विकसित करके की दम तोड़ेंगे। पर क्या आप जानते है सीमेंट कंक्रीट के इस आसमानी विकास की दौड़ से हम अपने राष्ट्र को विकसित कर लेंगे। क्या हम किसान, मजदूर , युवा, महिलाओं और गरीबों की सिर्फ बात करके भाषण देकर भारत को विकास की असली ऊंचाई पर पहुंचा सकेंगे।
विकास की सबसे छोटी और पहली इकाई है, मानव। भारत को विकसित बनने से पहले मानव के विकास की बात करनी चाहिए , क्योंकि बगैर इसके सबकुछ अधूरा है।
रक्षा शक्ति से लेकर ऊर्जा शक्ति और सॉफ्ट पावर से गति शक्ति तक किसी की बात करने से पहले मानव और उसको मिलने वाले मौके पर बात करनी चाहिए। हमें सड़क की गतिशीलता से अधिक शिक्षा और सामाजिक शक्ति को मजबूत करने की जरुरत है। जिसके जरिए देश में साइंस और साहित्य शक्ति बढेगी, और ये दोनों मानव की मानसिक और मसल्स पॉवर के साथ सांगठनिक शक्ति तो बढाएंगे ही देश की रक्षा में भी अमूल्य योग्दान दे सकेंगे। ताकि फिर से कोई विदेशी लूटेरा देश को लूटने और गुलाम बनाने के नहीं आ सकेगा।
भारतीय नागरिकों को अर्बन नक्सल से लेकर दिमागी नक्सल जैसे शब्दों से दूरी बनानी होगी। भविष्य और सामूहिक सामाजिक शक्ति के लिए सरकार और समाज को विरोधियों से संवाद करना चाहिए, ऐसे लोगों को नक्सली कहकर समझकर उन पर कार्रवाई करने से दूरी बनाना चाहिए। सब की बात होना ही तो असली लोकतंत्र की पहचान है।
एक तरफ हम विकसित भारत की बात कर रहे है, दूसरी तरफ हम एक दूसरे को ही घिनौने शब्दों और शुद्धिकरण जैसी प्रकिया से चोटिल कर रहे है।
सभी भारतीयों को देखना चाहिए कि आस्था के नाम पर देश कौन सा विकास रहा है, धर्म की आड़ में राजनेता और सरकार छोटे छोटे बच्चों का शोषण कर रही है। मासूम बच्चों से कावड़ उठवाकर हम किस सरकारी धर्म का पालन कर रहे है। क्या इससे धर्म के संरक्षण पर सवाल नहीं उठेगा। देश के मानव के लिए बने धर्म की मानवता को हम अपमानित नहीं कर रहे है। आजादी के 8 दशक होने के बाद भी आज हम घंटा बजाने और घुटने टेकने पर भरोसा कर रहे है।
एक चिंतन के रूप में यह कहा जा सकता है , क्या भारत विकास कर रहा है, कर रहा है तो कौन सा विकास रहा है। क्या वह रिट्रोग्रेसिव विकास की रेस में चल पड़ा है, या फिर प्रोग्रेसिव विकास कर रहा है।
उदाहरण से समझिए
एक व्यक्ति पढ़ाई के लिए गांव से निकलकर शहर आया , अध्ययन किया सरकारी सेवाएं दी, विदेश भी गया, दुनिया भर का ज्ञान और अनुभव प्राप्त किया। रिटायरमेंट के बाद वह पुन वह गांव में जाकर बस जाए , तो इस चक्रीय प्रोसेस को क्या कहेगे। उस व्यक्ति के लिए उसे प्रोग्रेसिव यानि प्रगतिशील विकास कहा जाएगा, लेकिन समाज और आगामी पीढ़ी के लिए इसे रिट्रोग्रेसिव यानी पीछे की ओर जाना विकास कहा जाएगा।
अब सवाल ये है कि इससे क्या नुकसान होगा। इससे नुकसान ये होगा उस व्यक्ति ने अपने स्तर पर जो ज्ञान और अनुभव प्राप्त किया, वह सीमित हो जाएगा, जिसका लाभ एक निश्चित एरिया में एक- दो पीढ़ी तक ही सिमट जाएगा। जबकि शहरों में विविधता भरे सोचनीय विचारणीय लोग रहते है, अलग अलग जगह के, अलग अलग समुदाय के, अलग अलग पीढ़ी के लोग मिलते-जुलते है। इनके बीच संघर्ष, ज्ञान और अनुभव को साझा कर अलग तरीके का आसान मार्ग बनाया जा सकता है जिसे बहुत बढ़ी एरिया में कम समय में ही प्रचारित किया जा सकता है।
भारत को सोचना चाहिए कि मंदिर-मठ- मस्जिद-चर्च-गुरुद्वारा और मूर्ति-प्रतिमा बनाने से कुछ हासिल नहीं होगा। स्लोगन में खूब प्रचारित किया जाता है कार्य ही पूजा है, लेकिन सामाजिक धरातल पर अलग ही नजरिया है। हर धर्म के लोग अपने अपने हिसाब से आस्था के नाम पर धर्म के चक्कर में साइंस और शिक्षा को भूल रहे है। विद्या-ज्ञान के लिए होने वाला दान धार्मिक संस्थाओं में शिफ्ट हो रहा है। शिक्षण संस्थाएं राजनीतिक और धार्मिक षड़यंत्र का अड्डा बन रही है। इससे सियासत में चढ़ावा चंदा चोरी जैसे मामले सामने आने लगे है, इससे आस्था और धर्म की छवि पर असर पड़ा है,वह धूमिल हो रही है। धर्म की गलत तरीके से व्याख्या हो रही है। ज्ञान-बुद्धि और कार्य से पवित्र होने वाला मानव पानी में स्नान के नाम की डुबकी लगाकर पवित्र होने की होड़ में मर रहा है या लाखों रूपए खर्च कर विदेशी भीड़ में। धार्मिक चढ़ावे से भारत मठ से मंदिर- मस्जिद, धम्म से धर्म और अब सरकारी धाम में बदल रहा है। सियासी धाम में आस्था के साथ साइंस पर ध्यान देने की जरुरत है। अन्यथा भारत चमक-दमक के विकसित- विकसित सियासी नेताओं के नारों में रिट्रोग्रेसिव मूड़ में बदल जाएगा। जो भारत और भारतवासियों के लिए किस ओर ले जाएगा। इसका उत्तर भविष्य की गर्त में छिपा है, बस इतना कहा जा सकता है किसी भी स्तर पर केंद्रीयकरण और एकाधिकार से हमेशा नुकसानदायक होता है।
डॉ आनंद वाणी
वरिष्ठ उपसंपादक
दैनिक भास्कर
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