राजनीति की लड़ाई में गढ़े सियासी शब्द, व्यवहार के साथ भाषा में भी मानव बनें दयालु और क्षमाशील

उग्रवादी -माओवादी-नक्सल, अर्बन नक्सल और अब दिमागी नक्सल ये सभी शब्द नेताओं की ओर से की गई टिप्पणी और तंज से निकले हुए है, जो राजनीति और इतिहास के अलग-अलग संदर्भों से जुड़े हैं। आजादी के आंदोलनों से शुरु हुए शब्द असली किसानों के लिए भूमि की लड़ाई से होते हुए सियासत में प्रशासनिक व्यवस्था के शब्द बन गए है। अब सबसे बड़ा सवाल ये है कि क्या विरोध करने वाले या लोकतंत्र में अपने हक अधिकार में आवाज उठाने वाले  जंगल के नक्सली का रुप बदल गया है, या नक्सली जंगल से निकलकर प्रशासन और सरकारी व्यवस्था का हिस्सा बन गए है। तो सबसे बड़ा सवाल है कि क्या ऐसे लोग सत्ता से सच में जंगलवासियों और किसानों के लिए सवाल करते है , उनके लिए हक मांगते है। या सिर्फ अपनी राजनीति चमकाते हैं।  

उग्रवाद

उग्रवादी एक व्यापक राजनीतिक शब्द है जो भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के 'गरम दल' (1905) से लेकर आधुनिक आक्रामक तेवर वाले राजनीतिक या वैचारिक गुटो के लिए इस्तेमाल होता है। उग्रवादी  शब्द किसी विशेष भौगोलिक स्थान से नहीं, बल्कि आक्रामक और आन्दोलनकारी कार्यशैली अपनाने वाले लोगों के लिए गढ़ा गया शब्द है। आपको बता दें भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में 1905 बंगाल विभाजन के बाद कांग्रेस के भीतर एक ऐसा दल उभरा जो अंग्रेजों के खिलाफ नरम रुख प्रार्थना और याचिका के खिलाफ था। इस  गरम दल विचार धारा वाले  बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय और विपिन चंद्र पाल (लाल-बाल-पाल) जैसे नेताओं को इतिहास में 'उग्रवादी ' या गरमपंथी कहा गया।

आज के समय में शासन-प्रणाली या कानून के विरुद्ध आक्रामक, विद्रोही या हिंसक व आक्रामक प्रतिरोध की विचारधारा का मार्ग अपनाने वाले किसी भी राजनीतिक या वैचारिक धड़े को सामान्य बोलचाल और प्रशासनिक भाषा में 'उग्रवादी' या वामपंथी उग्रवाद कहा जाता है।

माओवादी

माओवादी चीन के कम्युनिस्ट नेता माओ त्से-तुंग की सशस्त्र क्रांति की विचारधारा से उपजा हुआ शब्द है।  माओ त्से-तुंग ने 1920 के दशक से चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के भीतर इस क्रांति की कार्यप्रणाली को विकसित करना शुरू किया था। 

20वीं सदी के मध्य विशेषकर चीन की 1949 की क्रांति के बाद माओ ने यह सिद्धांत दिया कि सत्ता परिवर्तन और गरीबों के अधिकार केवल सशस्त्र ग्रामीण क्रांति या गुरिल्ला युद्ध से ही संभव हैं। 

माओ की क्रांतिकारी रणनीतियों का वर्णन करने के लिए इतिहासकार बेंजामिन आई. श्वार्ट्ज ने सबसे पहले 1951 में अंग्रेजी में "माओइज्म" (Maoism) शब्द का इस्तेमाल किया था। 

1960 के दशक में चीन-सोवियत विभाजन के बाद यह शब्द और विचारधारा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तेजी से  उभरी, जब चीन ने सोवियत संघ से अलग अपनी साम्यवादी पहचान स्थापित की।

पारंपरिक साम्यवाद जहां औद्योगिक मजदूरों पर जोर देता था, वहीं माओवाद ने ग्रामीण किसानों को क्रांति का मुख्य आधार बनाया।  माओवाद , आधिकारिक रूप से माओत्से तुंग विचार मार्क्सवाद-लेनिनवाद का एक प्रकार है जिसे माओत्से तुंग ने चीन गणराज्य और बाद में जनवादी चीन के कृषि प्रधान, पूर्व-औद्योगिक समाज में समाजवादी क्रांति को साकार करने के प्रयास में विकसित किया था 

नक्सल

नक्सल शब्द की उत्पत्ति 1967 में पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग जिले 'नक्सलबाड़ी' गाँव से हुई।

1967 में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के नेता चारू मजूमदार, कानू सान्याल और जंगल संथाल के नेतृत्व में स्थानीय किसानों और आदिवासियों ने जमींदारों के शोषण के खिलाफ एक सशस्त्र विद्रोह किया था। इस हिंसक और सशस्त्र आंदोलन की शुरुआत जिस 'नक्सलबाड़ी' गांव से हुई, उसी के नाम पर इस विचारधारा और इससे जुड़े लोगों को 'नक्सल' या 'नक्सलवादी' कहा जाने लगा।

1967 के नक्सलबाड़ी आंदोलन के प्रणेता चारू मजूमदार माओ की विचारधारा के पक्के समर्थक थे और उनका नारा था "चीन का रास्ता हमारा रास्ता है",  इसलिए नक्सलवादी आंदोलन को ही वैचारिक रूप से 'माओवाद' और इसके समर्थकों को 'माओवादी' कहा गया।

मजूमदार चीन के कम्यूनिस्ट नेता माओत्से तुंग के बहुत बड़े प्रशंसकों में से थे और उनका मानना था कि भारतीय श्रमिकों एवं किसानों की दुर्दशा के लिये सरकारी नीतियां उत्तरदायी हैं, जिसकी वजह से उच्च वर्गों का शासन तन्त्र और फलस्वरुप कृषितन्त्र पर दबदबा स्थापित हो गया है। इस न्यायहीन दमनकारी आधिपत्य को केवल सशस्त्र क्रान्ति से ही खत्म किया जा सकता है। 

1969 में पहली बार चारु माजूमदार और कानू सान्याल व जंगल संथाल ने भूमि अधिग्रहण को लेकर पूरे देश में सत्ता के खिलाफ एक व्यापक लड़ाई शुरू कर दी। भूमि अधिग्रहण को लेकर देश में सबसे पहले आवाज नक्सलवाड़ी से ही उठी थी। आंदोलनकारी नेताओं का मानना था कि जमीन उसी की, जो उस पर खेती करें। नक्सलवाड़ी से शुरु हुए आंदोलन का असर चुनावों पर पड़ा, कांग्रेस बंगाल की सत्ता से बाहर हो गई। 1977 में पहली बार पश्चिम बंगाल में कम्यूनिस्ट पार्टी सरकार के रूप में आई और ज्योति बसु मुख्यमंत्री बने।

सामाजिक जागृति के लिए शुरु हुए आंदोलन पर कुछ सालों बाद राजनीति का प्रभाव बढ़ने लगा और आंदोलन शीघ्र ही अपने मुद्दों और मार्ग से भटक गया।  

आंदोलन जब बि‌हार पहुंचा तब यह अपने मुद्दों से पूरी तरह भटक गया था। अब यह लड़ाई कृषि भूमि की लड़ाई न रहकर जातीय वर्ग की लड़‌ाई बन चुकी थी। यहां से  उच्च वर्ग और मध्यम वर्ग के बीच लड़ाई शुरु होना प्रारम्भ हो गई, उच्च और मध्यम वर्ग के बीच के इस उग्र संघर्ष से नक्सल ने देश में नया रूप धारण किया।  1972 में आंदोलन के हिंसक होने के कारण चारु मजूमदार को गिरफ्तार कर लिया है,  10 दिन के लिए कारावास के समय ही उनकी कारागृह में ही मौत हो गई।

नक्सलवादी आंदोलन के प्रणेता कानू सान्याल ने आंदोलन के राजनीति का शिकार होने के कारण और अपने मुद्दों से भटकने की वजह से तंग आकर 23 मार्च, 2010 को सुसाइड कर लिया था।


 


लोगों को कैसे जोड़ते है, पैसा कहां से आता है। 

क्रांतिकारी व्यक्तित्व  का नाम लेकर नक्सली  नये लोगों को अपने समूह में शामिल करते हैं। नौजवानों और विद्यार्थी को टारगेट किया जाता है। नक्सलियों के वित्तपोषण की बात की जाए तो सबसे बड़ा स्रोत खनन उद्योग है। नक्सली, अपने प्रभाव-क्षेत्र के सभी खनन कम्पनियों से हफ्ता वसूली करते है। डर के मारे सभी कम्पनी बगैर मना किए कमीशन देती हैं। ड्रग्स व्यापार से भी फंड मिलने की समय समय पर खबरें सामने आई । 

कई नक्सली संगठनों ने राजनीतिक दल बना लिए, जो देश में होने वाले चुनावों में शामिल होते है। नक्सलवाद की सबसे बड़ी मार आन्ध्र प्रदेश, तेलंगाना, छत्तीसगढ, उड़ीसा, झारखंड और बिहार को झेलनी पड़ी।


अर्बन नक्सल

अर्बन नक्सल (शहरी नक्सल) शब्द की उत्पत्ति और वैचारिक पृष्ठभूमि मूल रूप से भारत के पारंपरिक नक्सलवादी आंदोलन से जुड़ी है।  शहरों में रहकर माओवादी या वामपंथी उग्रवादी विचारधारा का समर्थन, वैचारिक प्रचार और रणनीतिक संचालन करने वाले बुद्धिजीवियों व कार्यकर्ताओं को अर्बन नक्सल कहा जाता है। 

पारंपरिक नक्सलवाद की शुरुआत वर्ष 1967 में बंगाल के दार्जिलिंग जिले के 'नक्सलबाड़ी' गांव से एक हिंसक किसान विद्रोह से हुई थी। शहरी विस्तार की रणनीति में नक्सलवाद वर्ष 2004 में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (माओवादी) द्वारा 'अर्बन पर्स्पेक्टिव' (Urban Perspective) नाम से एक गुप्त दस्तावेज जारी करने के बाद सामने आया। इस दस्तावेज में शहरों के बुद्धिजीवियों, छात्रों, वकीलों, कामगारों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को आंदोलन से जोड़ने और व्यवस्था के खिलाफ वैचारिक जमीन तैयार करने की रणनीति बनाई गई थी।

नक्सली आलोचकों, सरकार और सुरक्षा एजेंसियों का मानना रहा है कि जंगलों में सशस्त्र संघर्ष चलाने वाले संगठनों को वैचारिक संरक्षण, कानूनी सहायता और वित्तीय या नैतिक समर्थन शहरों में बैठे समर्थकों के जरिए मिलता है।

2018 में भीमा-कोरेगांव हिंसा और पुणे पुलिस की कार्रवाई के बाद यह शब्द मुख्यधारा की राजनीतिक और मीडिया बहस में तेजी से प्रचारित होते हुए सामने आया।

इसके बाद सत्तारूढ़ नेताओं की ओर से  विपक्षी विचारों, सरकार विरोधी प्रदर्शनों और वामपंथी-उदारवादी कार्यकर्ताओं की आलोचना के लिए इस शब्द का इस्तेमाल किया जाने लगा।

इस पर दो अलग अलग विचार सामने आते है, एक पक्ष का मानना है कि यह शब्द उन गुप्त तत्वों को उजागर करता है जो लोकतांत्रिक संस्थाओं जैसे मीडिया, शिक्षा और न्यायपालिका का इस्तेमाल देश की आंतरिक सुरक्षा को कमजोर करने के लिए करते हैं।  दूसरी ओर मानवाधिकार कार्यकर्ता तर्क देते हैं कि सरकार की नीतियों और सत्ता की आलोचना करने वाले हर असहमत स्वर  की आवाज को दबाने के लिए एक राजनीतिक हथियार के रूप में अर्बन नक्सल जैसे शब्दों का इस्तेमाल  किया जाता है।

दिमागी नक्सल 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 अगस्त 2026 को लाल किले की प्राचीर से अपने स्वतंत्रता दिवस संबोधन में  दिमागी नक्सल शब्द का इस्तेमाल किया, ये वैचारिक शब्द बौद्धिक नक्सलवाद के लिए इस्तेमाल किया गया एक सियासी शब्द  है। सरकार ने कई मौकों पर कहा है कि जंगलों में सक्रिय सशस्त्र नक्सलवाद का अब अंत हो चुका है, लेकिन वैचारिक स्तर पर शासन-प्रशासन व्यवस्था को प्रभावित करने वाले लोग अभी भी बने हुए है, जो समाज के लिए अब भी खतरा बने हुए हैं। माओवादी सोच रखने वाले कुछ लोगों ने दशकों तक सत्ता के गलियारों और सरकारी समितियों में सलाहकार के रूप में अपनी पैठ बनाई। प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में इसी संदर्भ में दिमागी नक्सली का उपयोग किया।

पीएम ने कहा कुछ लोग समाज को गलत दिशा में ले जाने के लिए तरह-तरह के दांव चल रहे हैं और ऐसे तत्वों को पहचानना जरूरी है।

पीएम ने देशवासियों से ऐसे 'दिमागी नक्सलियों' की पहचान करने और उन्हें अलग-थलग करने का आह्वान करते हुए कहा ये लोग सीधे हथियार नहीं उठाते, बल्कि नीतियों को प्रभावित करके समाज को भटकाने और अशांति फैलाने के मौके ढूंढते हैं। हालांकि पीएम के दिमागी नक्सल शब्द की  विपक्षी दलों और नेताओं ने तीखी आलोचना की है। विपक्षी  नेताओं का पीएम पर पलटवार करते हुए कहा  सरकार से सवाल पूछने या बौद्धिक विचार रखने को 'दिमागी नक्सल' कहा जाता है, तो उन्हें ऐसा कहलाने पर गर्व है। अन्य विरोधी नेताओं ने भी इसे राजनीतिक हमला करार देते हुए लाल किले के मंच के इस्तेमाल पर सवाल उठाते हुए इसे गंभीर बताया।

सरकार नक्सलवाद को भारत के इतिहास में आज तक आंतरिक सुरक्षा के लिए उत्पन्न सबसे बड़ा खतरा मानती है, जबकि यह तो हक और अधिकार मांगने वाली लड़ाई है। बस शांति और अहिंसा के देश में हिंसक और सशस्त्र के इस्तेमाल को जायज नहीं ठहराया जा सकता है। सरकारें यदि संवाद से समाधान और सबकी बात करने की बातें को अस्वीकार ना करे तो  विद्रोह अपने आप में ही सिमट जाता है। फिर ना उग्रवाद जन्म लेगा ना माओवाद और ना नक्सलवाद। रही बात भारत की , तो जम्बू द्वीप वाले भारत में  बौद्धों की सनातन और हिंदू परंपरा में प्राचीन समय से लेकर आज तक उपदेश देने से लेकर संवाद करने, कहने सुनने और लिखने की एक विशेष शैली और परपंरा रही है।

खूंखार हिंसकवादी अंगुलीमान से लेकर वीर योद्धा असोक ने भी तलवार छोड़ी थी। और अखंड भारत का सम्राट बना था, जिसका अशोक चक्र राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा में बीचों बीच बना हुआ है। देश के प्रधान भी इसी झंडे के नीचे से देश को संबोधित कर रहे थे।  

अशोक च्रक का नीला रंग आकाश और महासागर को बताने के साथ ये भी बताता है कि मनुष्य को अपना हृद्य इसी तरह बड़ा दयावान और क्षमावान होना चाहिए, तभी तो निरंतर प्रगति , गतिशील और कर्तव्य के मार्ग पर चल सकेगा। शायद असोक चक्र भारतवासियों को जो सीख देता है, उस सीख से सभी बैर रखने वाले मानव अनभिज्ञ है।   

ऐसे विकसित बुद्धि भू भाग वाले लोगों को सियासी सोच में दिमागी नक्सल की टिप्पणी किस उद्देश्य से की है, ये प्रधान ही बता सकते है, विपक्षी लोग भले ही इस पर गर्व करे या टिप्पणी को गंदी सोच की उपज बताए। लेकिन अंतत: हम अपने ही देश में ,अपने ही भारतवासियों को ऐसी टिप्पणी से संबोधित करना पूरी तरह से अनुचित और अन्यायपूर्ण है। राजनीतिक दलों और नेताओं का पक्ष-विपक्ष में आना जाना बना रहता है। लेकिन अपनी ही मानव जाति को तंज भरी अभद्र टिप्पणी से संबोधित करना प्रचलन में आकर मानव -टू -मानव वार-पलटवार का शब्द बन जाता है, जो आगामी समय में हिंसक गाली के तौर पर इस्तेमाल हो सकता है। 


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