नोट्स के बजाय नई क्रिएटिव सोच देना, असली टीचर की पहचान
टीचर" शब्द का अर्थ बस स्कूल, कॉलेज, कोचिंग में पढ़ाने वाले टीचर्स से नहीं होता है? टीचर हमारे जीवन का हर वह व्यक्ति है जिससे हमने कुछ सीखा हो और जिसने सिखाया हो ,जैसे कि मां बाप हमे जीवन मे बहुत कुछ सिखाते है , दोस्त भी हमे कुछ न कुछ सीख देते है, कई ऐसे रिश्ते जो हमें कहीं न कहीं बहुत सी बातें सिखा जाते है, कई ऐसे अजनबी व्यक्ति भी हमारे जीवन में आते है जो कुछ ही मिनटों में बहुत अच्छी सीख दे जाते है, कुछ ऐसी किताबें जिन्हें पढ़कर भी हम बहुत कुछ सीखते ,और कुछ जीवन के ऐसे दृश्य जिन्हें देखकर हमे अच्छी बुरी सीखे मिलती है। टीच शब्द का मतलब सीख ,जो हमें कभी भी किसी भी रूप में मिल सकती है
अब एक टीचर वह जो हमें स्कूल, कॉलेज या किसी शैक्षणिक संस्था जैसे कोचिंग में मिलते है जो हमें बेहतर भविष्य के लिए जागरूक, शिक्षित करते है जिससे हम अपना जीवन अच्छे से व्यतीत कर पाए आगे बढ़ पाए अपनी इच्छाओं को पूरा कर पाए।
मेरे अनुसार हर वह व्यक्ति, हर एक दृश्य, रिश्ते, किताबें टीचर है जो हमें सिखाते है या जिनसे हम सीखते है, सब टीचर है।
आज का टीचर मानसिक तौर से लेकर व्यवहारिक और व्यापारिक होने के साथ साथ गुलाम होता जा रहा है, ऑनलाइन ई अटेंडेंस से लेकर घंटा भर का गुरु, गुरुघंटाल बनने में लगे हुए हैं।
शिक्षा के लिए जिस गुरु को सेवा भाव के उद्देश्य से समाज ने भगवान का दर्जा दिया सरकारों और व्यवस्थाओं ने उसे संविदा कॉन्ट्रैक्ट बेस और अतिथि बना दिया।
प्राचीन भारतीय इतिहास में साधु संतों ने अलग अलग विचारधाराओं में समाज में शिक्षा देने का काम सेवा भाव से किया, समाज से लेकर सत्तासीन राजा के महलों में भी गुरुओं की परम्परा दशकों तक बरकरार रही, तब उपदेशों के माध्यम से शिक्षा दी जाती थी, शिक्षा का मंच एक खुली निःशुल्क सेवा थी, शिक्षा-भिक्षा ही ज्ञान को आगे बढ़ाने की परम्परा थी, जो पीढ़ी दर पीढ़ी चलती थी, जिसके लिए सनातन शब्द का इस्तेमाल किया जाता है, कहने बोलने के बाद जैसे ही पत्थरों पर टांकी हथौड़े से लेखनी शुरू हुई, शिक्षा का खुला मंच दीवारों और संगठित होते होते गुफा और पत्थर संस्थाओं तक सीमित होता चला गया। खुला मंच का गुरु गुफाओं में ज्ञान अर्जन के साथ प्रवचन देने में लग गए, नई नई विचार धारा जनरेट हुई, गुरु अब पुजारी बन गए। ज्ञान आदान-प्रदान की खुली मंच पत्थर की दीवारों में सिमट एक संस्थान में तब्दील हो गई। सनातन- बौद्ध धर्म में मठ हिंदू पंथ में मंदिर और मुस्लिम शासनकाल में मदरसों, ईसाई धर्म में चर्च में शिक्षा होने लगी।
आदरपूर्वक शिक्षक को मठ जैसी आध्यात्मिक संस्थान में गुरु आचार्य, महंत और मठाधीश कहा जाता है। मदरसे के शिक्षक को उस्ताद, मौलाना, मुदर्रिस, कभी मौलाना मुफ्ती और आलिम भी कहा जाता है। चर्च में पादरी फादर पास्टर और प्रचारक कहा जाता है।
कहने को कहा जाता है अतिथि भगवान के समान होता है, लेकिन शिक्षा के क्षेत्र में शैक्षणिक संस्थानों में इसे भगवान नहीं , घंटाभर का टीचर कहा जाता है। इसे कई नामों से जाना जाता है, जैसे गेस्ट टीचर, अतिथि व्याख्याता, पार्ट टाइम टीचर, अंशकालिक, अनुबंध -संविदा , विजिटिंग और मेहमान शिक्षक का कहा जाता है। शब्द कुछ भी हो लेकिन भारतीय परंपरा जिस गुरु को इतना सम्मान दिया जाता है, सरकार की नीतियों और उसकी व्यावसायिक शिक्षा व्यवस्था में ये शिक्षक के नए नाम है। ज्ञान के बल पर जब भारत विश्व गुरु था, उसी देश में उसके गुरुओं के लिए नए नए नाम आज सामने आ रहे है।
समय के साथ साथ सामाजिक सेवा से होते हुए धार्मिक सेवा में तब्दील हो गई। राज और राजनीति के दौर में रणनीति के तौर पर गुरु- कुलगुरु बने तो राज में धर्म घुसने लगा फिर बात राजधर्म की होने लगी। मानवीय सेवा का गुरु समय के साथ साथ धार्मिक और शासन व्यवस्था में उसके कर्तव्य स्थल से लेकर उसके कर्म बदल गए। ज्ञान का पंडित पुजारी बना तो वह पूजा तक सीमित हो गया, सेवा का शिक्षक, राज और राजनीति का शिकार हो गया। लोकतांत्रिक व्यवस्था में परमानेंट पेंशन का अध्यापक गुरु - टीचर -अध्यापक-प्राध्यापक बना, शासन स्तर पर साजिश हुई तो स्टूडेंट का सर और समाज में प्रचलित गुरु कॉन्ट्रेक्ट संविदा से टेम्परेरी तौर पर अतिथि हो गया। समाज सेवा का एक शिक्षक आज एक गेस्ट फैकल्टी के तौर पर एक नई फैसिलिटी बन गई है। जो संकीर्ण सोच में पढ़ाने से अलग, अन्याय से बचने के लिए कानाफूसी तक सीमित होकर गुलाम और चमचागिरी तक सिमट गई। सरकार ने कम वेतन में सम्मानजनक शिक्षक को एक सुविधा बना दिया। परमानेंट होने का लालच इन्हें दशकों तक इंतजार करवाता है। घंटेभर के पेमेंट में दिनभर ऑफिस का कार्य करना सरलता में एक सस्ते संसाधन की सहूलियत शिक्षा के भविष्य के साथ खतरा है।
स्वार्थ में शिक्षा के पुजारी को गुरू से क्लर्क बना दिया। ऑनलाईन अटेंडेंस और निश्चित समय की ड्यूटी सीमा ने सेवा के गुरु को व्यवसायिक घंटाभर का ज्ञान देने वाला बना दिया है। इंटरनेट और मोबाइल दुनिया के आने से पहले के गुरुओं के बारे में पता करेंगे तो पता चलेगा कि गुरु अपने स्टूडेंट के साथ -जिज्ञासाओं को परीक्षा होने और उसके बाद बिना किसी धन लालच के साथ देता। आज का नया स्टूडेंट शॉर्ट नोट्स तक सिमट रहा है. अपने टीचर से भी वह उम्मीद करता है कि जैसे तैसे नोट्स मिल जाए, जिन्हें रटकर काम चल जाए। लेकिन एक अध्यापक को अपने स्टूडेंट को छोटे- छोटे उत्तर के नोट्स नहीं बल्कि एक नई क्रिएटिव सोच देना चाहिए। नोट्स के बजाय बेहतर बनाने के लिए मोटिवेट करना चाहिए।
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